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Etawah News: डूब गई तैयारी, 40 गांवों पर मंडरा रहा बाढ़ का खतरा
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इटावा/चकरनगर। मानसून की दस्तक से जिले की बड़ी आबादी की चिंता बढ़ गई है। यमुना और चंबल की बाढ़ झेलने वाले चकरनगर के 40 गांवों पर इस बार भी संकट बना हुआ है। प्रशासन ने बाढ़ से बचाव की 5.94 करोड़ रुपये की कार्ययोजना शासन को भेजी थी। मानसून सिर पर होने के बावजूद योजना मंजूर नहीं हुई है। ग्रामीणों को आशंका है कि इस बार भी बाढ़ आने पर उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाएगा।
लोक निर्माण विभाग ने करीब छह करोड़ रुपये की स्थायी समाधान कार्ययोजना बनाई थी। इस कार्ययोजना में नीमरी के पास फूप-चौरेला मार्ग पर कटी पुलिया के स्थान पर 40 लाख रुपये का बॉक्स कल्वर्ट निर्माण प्रस्तावित था। गुरभेली गांव के लिए 2.80 करोड़ रुपये से दो किलोमीटर ऊंचा संपर्क मार्ग का प्रस्ताव था। रनिया मजरा तक पहुंच के लिए 60 लाख रुपये से 840 मीटर कच्चा रास्ता पक्का करने की योजना थी। ललुपुरा और चौरेला के बीच 1.34 किलोमीटर सड़क को 1.39 करोड़ रुपये से ऊंचा करने का काम भी इसमें शामिल था।
कुंदौल पंचायत के राजपुर स्थित मंडी स्थल को 75 लाख रुपये से बाढ़ राहत केंद्र बनाने का प्रस्ताव था। भरेह-हरौली मार्ग की पुलिया के पुनर्निर्माण के लिए भी 60 लाख रुपये का प्रस्ताव भेजा गया था। इन सभी योजनाओं को अब तक स्वीकृति नहीं मिली है। जून समाप्त हो रहा है और जुलाई-अगस्त में बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है। प्रशासनिक तैयारियां केवल कागजों तक ही सीमित दिख रही हैं। योजनाओं को मंजूरी न मिलने से जमीनी काम शुरू नहीं हुआ है। इससे 40 गांवों के लोगों में गहरी निराशा है। उन्हें डर है कि इस बार भी उन्हें बाढ़ का सामना अकेले करना पड़ेगा।
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पिछले वर्ष आई भीषण बाढ़ की भयावह तस्वीरें आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं। 31 जुलाई 2025 को चंबल नदी का जलस्तर खतरे के निशान 120.80 मीटर को पार करते हुए 126.89 मीटर तक पहुंच गया था। वहीं क्वारी नदी का जलस्तर भी खतरे के निशान 125.96 मीटर से बढ़कर 129.07 मीटर दर्ज किया गया था।
गत वर्ष भरेह, हरौली बहादुरपुर, नीमाडांडा, धरमपुरा, निवी, गढ़ाकास्दा, चकरपुरा, पथर्रा, खेरापुरा, ख्यालीपुरा, नगरापुरा, गनेशपुरा, इमलिया, पहलन, हरपुरा, महुआसूंड़ा, कांयछी, पालीघार, खिरीटी, रनिया, ककरैया, बिरौनाबाग, कोटरा, गुरभेली और नौरगा समेत दर्जनों गांवों के मार्ग जलमग्न हो गए थे। नदा मार्ग पर पानी भरने से नदा, मिटहठी, सिरसा और टिटावली सहित 14 गांवों के लोगों को हनुमंतपुरा होकर लंबा चक्कर लगाकर तहसील मुख्यालय पहुंचना पड़ा था। बाढ़ के दौरान तहसील प्रशासन ने गढ़ाकास्दा, भजनपुरा, चौरेला, हरौली बहादुरपुर और भरेह गांवों के करीब 50 परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया था। लेकिन पानी उतरने के बाद स्थायी इंतजाम की दिशा में अपेक्षित कदम नहीं उठाए गए।
हरौली बहादुरपुर निवासी रामसिंह बताते हैं कि बाढ़ का पानी अचानक गांव में घुस आया था। देखते ही देखते पानी घर में भर गया। परिवार के साथ जंगल में झोपड़ी बनाकर जंगली जानवरों के डर के बीच टीले पर भूखे पेट रात गुजारी थी। प्रशासन ने पक्के मकान का आश्वासन दिया था। लेकिन आज भी पक्के मकान की आस लगाए बैठे हैं।
भरेह गांव की ममता देवी कहती हैं कि बाढ़ में घर का सामान, अनाज और घरेलू वस्तुएं बह गई थीं। 60 दिनों तक परिवार के साथ सरकारी स्कूल में रहकर गुजारा करना पड़ा। अब भी बारिश शुरू होते ही डर सताने लगता है। कॉलोनी का आश्वासन भी पूरा नहीं हुआ है।
हरौलीबहादुर के कृपाराम निषाद का कहना है कि नदी के कटान से उनका मकान क्षतिग्रस्त होकर गिर गया था। मेहनत की कमाई से बनाया घर पलभर में मिट्टी में मिल गया। प्रशासन से मदद के नाम से चना, लाई, राशन मिला, लेकिन नुकसान की भरपाई नहीं हो सकी।
ककरैया निवासी चुन्नी देवी बताती हैं कि बाढ़ के दौरान पूरा परिवार तंबू तानकर खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हो गया था। बच्चों और बुजुर्गों को सबसे ज्यादा परेशानी उठानी पड़ी। वह कहती हैं कि हर साल बाढ़ का डर बना रहता है, इसलिए स्थायी इंतजाम बेहद जरूरी हैं।
बाढ़ चौकी, नौका, कर्मचारी की लिस्ट अपडेट कराई जा रही है। बाढ़ का अलर्ट मिलते ही लोगों को सजग किया जाएगा। राजपुर मंडी को बाढ़ राहत केंद्र बनाने की जानकारी नहीं है।
- रोहित कुमार मौर्य, एसडीएम
लोक निर्माण विभाग ने करीब छह करोड़ रुपये की स्थायी समाधान कार्ययोजना बनाई थी। इस कार्ययोजना में नीमरी के पास फूप-चौरेला मार्ग पर कटी पुलिया के स्थान पर 40 लाख रुपये का बॉक्स कल्वर्ट निर्माण प्रस्तावित था। गुरभेली गांव के लिए 2.80 करोड़ रुपये से दो किलोमीटर ऊंचा संपर्क मार्ग का प्रस्ताव था। रनिया मजरा तक पहुंच के लिए 60 लाख रुपये से 840 मीटर कच्चा रास्ता पक्का करने की योजना थी। ललुपुरा और चौरेला के बीच 1.34 किलोमीटर सड़क को 1.39 करोड़ रुपये से ऊंचा करने का काम भी इसमें शामिल था।
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कुंदौल पंचायत के राजपुर स्थित मंडी स्थल को 75 लाख रुपये से बाढ़ राहत केंद्र बनाने का प्रस्ताव था। भरेह-हरौली मार्ग की पुलिया के पुनर्निर्माण के लिए भी 60 लाख रुपये का प्रस्ताव भेजा गया था। इन सभी योजनाओं को अब तक स्वीकृति नहीं मिली है। जून समाप्त हो रहा है और जुलाई-अगस्त में बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है। प्रशासनिक तैयारियां केवल कागजों तक ही सीमित दिख रही हैं। योजनाओं को मंजूरी न मिलने से जमीनी काम शुरू नहीं हुआ है। इससे 40 गांवों के लोगों में गहरी निराशा है। उन्हें डर है कि इस बार भी उन्हें बाढ़ का सामना अकेले करना पड़ेगा।
पिछले वर्ष आई भीषण बाढ़ की भयावह तस्वीरें आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं। 31 जुलाई 2025 को चंबल नदी का जलस्तर खतरे के निशान 120.80 मीटर को पार करते हुए 126.89 मीटर तक पहुंच गया था। वहीं क्वारी नदी का जलस्तर भी खतरे के निशान 125.96 मीटर से बढ़कर 129.07 मीटर दर्ज किया गया था।
गत वर्ष भरेह, हरौली बहादुरपुर, नीमाडांडा, धरमपुरा, निवी, गढ़ाकास्दा, चकरपुरा, पथर्रा, खेरापुरा, ख्यालीपुरा, नगरापुरा, गनेशपुरा, इमलिया, पहलन, हरपुरा, महुआसूंड़ा, कांयछी, पालीघार, खिरीटी, रनिया, ककरैया, बिरौनाबाग, कोटरा, गुरभेली और नौरगा समेत दर्जनों गांवों के मार्ग जलमग्न हो गए थे। नदा मार्ग पर पानी भरने से नदा, मिटहठी, सिरसा और टिटावली सहित 14 गांवों के लोगों को हनुमंतपुरा होकर लंबा चक्कर लगाकर तहसील मुख्यालय पहुंचना पड़ा था। बाढ़ के दौरान तहसील प्रशासन ने गढ़ाकास्दा, भजनपुरा, चौरेला, हरौली बहादुरपुर और भरेह गांवों के करीब 50 परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया था। लेकिन पानी उतरने के बाद स्थायी इंतजाम की दिशा में अपेक्षित कदम नहीं उठाए गए।
हरौली बहादुरपुर निवासी रामसिंह बताते हैं कि बाढ़ का पानी अचानक गांव में घुस आया था। देखते ही देखते पानी घर में भर गया। परिवार के साथ जंगल में झोपड़ी बनाकर जंगली जानवरों के डर के बीच टीले पर भूखे पेट रात गुजारी थी। प्रशासन ने पक्के मकान का आश्वासन दिया था। लेकिन आज भी पक्के मकान की आस लगाए बैठे हैं।
भरेह गांव की ममता देवी कहती हैं कि बाढ़ में घर का सामान, अनाज और घरेलू वस्तुएं बह गई थीं। 60 दिनों तक परिवार के साथ सरकारी स्कूल में रहकर गुजारा करना पड़ा। अब भी बारिश शुरू होते ही डर सताने लगता है। कॉलोनी का आश्वासन भी पूरा नहीं हुआ है।
हरौलीबहादुर के कृपाराम निषाद का कहना है कि नदी के कटान से उनका मकान क्षतिग्रस्त होकर गिर गया था। मेहनत की कमाई से बनाया घर पलभर में मिट्टी में मिल गया। प्रशासन से मदद के नाम से चना, लाई, राशन मिला, लेकिन नुकसान की भरपाई नहीं हो सकी।
ककरैया निवासी चुन्नी देवी बताती हैं कि बाढ़ के दौरान पूरा परिवार तंबू तानकर खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हो गया था। बच्चों और बुजुर्गों को सबसे ज्यादा परेशानी उठानी पड़ी। वह कहती हैं कि हर साल बाढ़ का डर बना रहता है, इसलिए स्थायी इंतजाम बेहद जरूरी हैं।
बाढ़ चौकी, नौका, कर्मचारी की लिस्ट अपडेट कराई जा रही है। बाढ़ का अलर्ट मिलते ही लोगों को सजग किया जाएगा। राजपुर मंडी को बाढ़ राहत केंद्र बनाने की जानकारी नहीं है।
- रोहित कुमार मौर्य, एसडीएम