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Farrukhabad News: गंगा की धार में बहे पांच और मकान
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फर्रुखाबाद। गंगा में विकराल होती बाढ़ से दिलीप की मड़ैया और दौली की मड़ैया का नामोनिशान मिटने के कगार पर है। शनिवार तड़के एक और शाम के समय चार और ग्रामीणों का मकान गंगा में समा गया। एक मकान का दरवाजा चला गया। जलस्तर तेजी से बढ़ने की वजह से एक गली का चंद हिस्सा ही बचा है। शेष घरों में चूल्हे भी जलाने की जगह नहीं है। खूंटों पर बंधे जानवर भी भूखे हैं। लोग अपने आशियाने तोड़ने में जुटे हैं।
शनिवार तड़के दिलीप की मड़ैया के नरवीर का मकान कट गया। दिन में गंगा की कुछ मेहरबानी रही। पूरे दिन लोग मकानों को तोड़कर सरिया व ईंटों को निकालकर बैलगाड़ियों से दूर पानी भरे खेतों और कुछ मोटरबोट से शहर के किनारे लाकर रख रहे हैं। शाम करीब चार बजे एक साथ शुरू हुए कटान में स्व. गंगा सिंह की पत्नी प्रेमलता, प्रेमचंद्र, उनके पुत्र श्याम, राजेश के पक्के मकान भी गंगा में समा गए। गांव में सभी मकानों पर हथौड़े चल रहे हैं। गांव के हालात ऐसे हैं कि अब एक गली का चंद हिस्सा ही सूखा दिख रहा है। पूरे गांव में उदासी का माहौल है। शनिवार को गांव में राजस्व विभाग के लोग नहीं पहुंचे।
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बच्चों को दिलासा दे रहीं माताएं
गांव में बचे परिवारों के मासूमों को क्या पता कि इस समय मंजर क्या है। घरों में चूल्हे जलने के हालात नहीं हैं। वह जब भी खाना मांगते हैं, तो उन्हें माताएं दिलासा देकर ही काम चलाती हैं। परिवार के एक युवा को सुबह नाव से बाजार भेज कर कुछ नाश्ता मंगवाकर बच्चों को खिलाने को मजबूर हैं।
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फोटो-38 दिलीप की मड़ैया में अंतिम बार गांव देखने पहुंची गुमशुम खड़ी बेटियां। संवाद
-एक किमी मोटर बोट पर बैठकर गांव पहुंचीं बेटियां रो पड़ीं
संवाद न्यूज एजेंसी
फर्रुखाबाद। जिस घर और कमरे में जन्म लिया, वह कई पीढ़ियों के लिए विदा हो रहा है। पूछने पर अब किसे बताएंगे कि हमारी जहां जन्मभूमि है, वहां इस समय गंगा का अथाह जल बह रहा है। गंगा में बहते अपनों के घरों को देखने आई हूं। सबसे अधिक दर्द तो अपनों के बिखरने का है। अब पूरे जीवन चाची-चाचा, दादी-दादा, भाई-भाभियों व बहनों को देखने दूर-दूर जाना पड़ेगा। इतना कहते हुए दिलीप की मड़ैया पहुंची बेटियां रो पड़ीं।
गांव के महेंद्र के भाई स्व. अनेकराम की बेटी नीरज की ससुराल शहर के मोहल्ला अमीन खां में है। उन्हें गांव के कटने की जानकारी हुई तो वह शनिवार सुबह मोटर बोट से गांव पहुंचीं। अपनी चाची संतोषी देवी से गले लगकर रो पड़ीं। बताया कि पिछली साल की बाढ़ में उनके पिता का मकान गिर गया था। उनके भाई राममू्र्ति का भी निधन हो गया। मकान गिरने के बाद भाभी और मां कटरी धर्मपुर गोशाला के पास सड़क पर झोपड़ी डालकर जीवन काट रही हैं। चाचा का मकान भी मुहाने पर है। अंतिम बार जन्मभूमि देखने आई हैं। कहा कि अब वह यहां कभी नहीं आ सकेंगी। संतोषी की बहन शांति देवी का भी गांव से बेहद लगाव है। मकानों को गिरते देख वह भी अपनों का दर्द देख काफी परेशान दिखीं।
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शनिवार तड़के दिलीप की मड़ैया के नरवीर का मकान कट गया। दिन में गंगा की कुछ मेहरबानी रही। पूरे दिन लोग मकानों को तोड़कर सरिया व ईंटों को निकालकर बैलगाड़ियों से दूर पानी भरे खेतों और कुछ मोटरबोट से शहर के किनारे लाकर रख रहे हैं। शाम करीब चार बजे एक साथ शुरू हुए कटान में स्व. गंगा सिंह की पत्नी प्रेमलता, प्रेमचंद्र, उनके पुत्र श्याम, राजेश के पक्के मकान भी गंगा में समा गए। गांव में सभी मकानों पर हथौड़े चल रहे हैं। गांव के हालात ऐसे हैं कि अब एक गली का चंद हिस्सा ही सूखा दिख रहा है। पूरे गांव में उदासी का माहौल है। शनिवार को गांव में राजस्व विभाग के लोग नहीं पहुंचे।
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बच्चों को दिलासा दे रहीं माताएं
गांव में बचे परिवारों के मासूमों को क्या पता कि इस समय मंजर क्या है। घरों में चूल्हे जलने के हालात नहीं हैं। वह जब भी खाना मांगते हैं, तो उन्हें माताएं दिलासा देकर ही काम चलाती हैं। परिवार के एक युवा को सुबह नाव से बाजार भेज कर कुछ नाश्ता मंगवाकर बच्चों को खिलाने को मजबूर हैं।
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फोटो-38 दिलीप की मड़ैया में अंतिम बार गांव देखने पहुंची गुमशुम खड़ी बेटियां। संवाद
-एक किमी मोटर बोट पर बैठकर गांव पहुंचीं बेटियां रो पड़ीं
संवाद न्यूज एजेंसी
फर्रुखाबाद। जिस घर और कमरे में जन्म लिया, वह कई पीढ़ियों के लिए विदा हो रहा है। पूछने पर अब किसे बताएंगे कि हमारी जहां जन्मभूमि है, वहां इस समय गंगा का अथाह जल बह रहा है। गंगा में बहते अपनों के घरों को देखने आई हूं। सबसे अधिक दर्द तो अपनों के बिखरने का है। अब पूरे जीवन चाची-चाचा, दादी-दादा, भाई-भाभियों व बहनों को देखने दूर-दूर जाना पड़ेगा। इतना कहते हुए दिलीप की मड़ैया पहुंची बेटियां रो पड़ीं।
गांव के महेंद्र के भाई स्व. अनेकराम की बेटी नीरज की ससुराल शहर के मोहल्ला अमीन खां में है। उन्हें गांव के कटने की जानकारी हुई तो वह शनिवार सुबह मोटर बोट से गांव पहुंचीं। अपनी चाची संतोषी देवी से गले लगकर रो पड़ीं। बताया कि पिछली साल की बाढ़ में उनके पिता का मकान गिर गया था। उनके भाई राममू्र्ति का भी निधन हो गया। मकान गिरने के बाद भाभी और मां कटरी धर्मपुर गोशाला के पास सड़क पर झोपड़ी डालकर जीवन काट रही हैं। चाचा का मकान भी मुहाने पर है। अंतिम बार जन्मभूमि देखने आई हैं। कहा कि अब वह यहां कभी नहीं आ सकेंगी। संतोषी की बहन शांति देवी का भी गांव से बेहद लगाव है। मकानों को गिरते देख वह भी अपनों का दर्द देख काफी परेशान दिखीं।