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Farrukhabad News: गैंगस्टर एक्ट में तारिक की जमानत अर्जी हुई खारिज
संवाद न्यूज एजेंसी, फर्रूखाबाद
Updated Fri, 30 Jan 2026 01:00 AM IST
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फर्रुखाबाद। गिरोहबंद एवं समाज विरोधी क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम के मामले में विशेष न्यायाधीश गैंगस्टर एक्ट/अपर सत्र न्यायाधीश दीपेंद्र कुमार सिंह ने तारिक उर्फ तालिब की जमानत अर्जी खारिज कर दी।
कायमगंज कोतवाली प्रभारी मदन मोहन चर्तुवेदी ने 23 दिसंबर 2025 गैंगस्टर एक्ट के तहत जुबैर खान, रामनरेश, सुखवीर, पुष्पेंद्र, आदेश, मोबिन, तारिक उर्फ तालिब और पवन मिश्रा के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराई थी। इसमें कहा था कि गिरोह का सरगना जुबैर खान है। गिरोह कूट रचित दस्तावेजों के आधार पर फर्जी फर्म व कंपनियां खोलकर तंबाकू व्यापार की आड़ में बड़े पैमाने पर टैक्स चोरी करता है। इससे राज्य को आर्थिक क्षति हुई।
आरोपी के अधिवक्ता ने इसे रंजिशन कार्रवाई बताते हुए जमानत देने की मांग की। कहा कि तारिक का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। पूर्व में गैंगस्टर एक्ट के तहत दर्ज एक मामला उच्च न्यायालय ने तकनीकी आधार पर निरस्त कर दिया है। विशेष लोक अभियोजक गैंगस्टर एक्ट ने जमानत अर्जी का विरोध करते हुए कहा कि अभियुक्त गिरोह का सक्रिय सदस्य है। उसके फरार होने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। ऐसे में अग्रिम जमानत का कोई आधार नहीं है। न्यायालय ने पत्रावली में उपलब्ध साक्ष्यों का अवलोकन करते हुए दोनों पक्षों की दलीलें सुनी। न्यायालय ने अभियुक्त को संगठित गिरोह का सदस्य मानते हुए जमानत अर्जी खारिज कर दी।
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कायमगंज कोतवाली प्रभारी मदन मोहन चर्तुवेदी ने 23 दिसंबर 2025 गैंगस्टर एक्ट के तहत जुबैर खान, रामनरेश, सुखवीर, पुष्पेंद्र, आदेश, मोबिन, तारिक उर्फ तालिब और पवन मिश्रा के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराई थी। इसमें कहा था कि गिरोह का सरगना जुबैर खान है। गिरोह कूट रचित दस्तावेजों के आधार पर फर्जी फर्म व कंपनियां खोलकर तंबाकू व्यापार की आड़ में बड़े पैमाने पर टैक्स चोरी करता है। इससे राज्य को आर्थिक क्षति हुई।
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आरोपी के अधिवक्ता ने इसे रंजिशन कार्रवाई बताते हुए जमानत देने की मांग की। कहा कि तारिक का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। पूर्व में गैंगस्टर एक्ट के तहत दर्ज एक मामला उच्च न्यायालय ने तकनीकी आधार पर निरस्त कर दिया है। विशेष लोक अभियोजक गैंगस्टर एक्ट ने जमानत अर्जी का विरोध करते हुए कहा कि अभियुक्त गिरोह का सक्रिय सदस्य है। उसके फरार होने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। ऐसे में अग्रिम जमानत का कोई आधार नहीं है। न्यायालय ने पत्रावली में उपलब्ध साक्ष्यों का अवलोकन करते हुए दोनों पक्षों की दलीलें सुनी। न्यायालय ने अभियुक्त को संगठित गिरोह का सदस्य मानते हुए जमानत अर्जी खारिज कर दी।
