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Farrukhabad News: प्रेमचंद की कलम से समाज का यथार्थ, गुप्त की रचनाओं में जागरण का संदेश
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फर्रुखाबाद। साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था अभिव्यंजना के तत्वावधान में एनएकेपी महाविद्यालय के सभागार में मुंशी प्रेमचंद, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन और राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की जयंती के उपलक्ष्य में विचार गोष्ठी हुई। वक्ताओं ने तीनों साहित्यकारों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए उनके साहित्य को वर्तमान पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत बताया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. शिवओम ''अंबर'' ने की। उन्होंने तीनों साहित्यकारों को नमन करते हुए बताया कि दो अगस्त को हिंदी के प्रतिष्ठित कवि एवं नवगीतकार उमाकांत मालवीय की भी जयंती है। उन्होंने पौराणिक संदर्भों की आधुनिक व्याख्या करते हुए मिथकीय कहानियों और ललित निबंधों की रचना की।
कार्यक्रम समन्वयक भूपेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि हिंदी के रचनाकार अपने समय के चिंतक, प्रेरक और विचारक रहे, जिन्होंने सामाजिक एवं ऐतिहासिक घटनाओं को अपनी रचनाओं में अभिव्यक्ति दी। उन्होंने मैथिलीशरण गुप्त की रचना ''नर हो न निराश करो मन को'' का उल्लेख करते हुए उनके साहित्य में निहित जागरण और स्त्री विमर्श को रेखांकित किया।
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भारती मिश्रा ने कहा कि प्रेमचंद ने तत्कालीन समाज का यथार्थ चित्रण किया। डॉ. राजकुमार सिंह ने राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन के हिंदी के लिए संघर्ष, त्याग और अडिगता को याद किया। प्राचार्या डॉ. पारुल मिश्रा ने कहा कि बड़ों का सानिध्य और प्रेरक प्रसंग जीवन को सही दिशा देते हैं।
संचालन वैभव सोमवंशी ने किया। इस दौरान डॉ. राजेश हजेला, निमिष टंडन, संजय गर्ग, महेश पाल सिंह, गुंजा जैन, प्रीति रायजादा, आलोक रायजादा, प्रियांशु पांडेय, अरविंद दीक्षित आदि मौजूद रहे।
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कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. शिवओम ''अंबर'' ने की। उन्होंने तीनों साहित्यकारों को नमन करते हुए बताया कि दो अगस्त को हिंदी के प्रतिष्ठित कवि एवं नवगीतकार उमाकांत मालवीय की भी जयंती है। उन्होंने पौराणिक संदर्भों की आधुनिक व्याख्या करते हुए मिथकीय कहानियों और ललित निबंधों की रचना की।
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कार्यक्रम समन्वयक भूपेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि हिंदी के रचनाकार अपने समय के चिंतक, प्रेरक और विचारक रहे, जिन्होंने सामाजिक एवं ऐतिहासिक घटनाओं को अपनी रचनाओं में अभिव्यक्ति दी। उन्होंने मैथिलीशरण गुप्त की रचना ''नर हो न निराश करो मन को'' का उल्लेख करते हुए उनके साहित्य में निहित जागरण और स्त्री विमर्श को रेखांकित किया।
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भारती मिश्रा ने कहा कि प्रेमचंद ने तत्कालीन समाज का यथार्थ चित्रण किया। डॉ. राजकुमार सिंह ने राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन के हिंदी के लिए संघर्ष, त्याग और अडिगता को याद किया। प्राचार्या डॉ. पारुल मिश्रा ने कहा कि बड़ों का सानिध्य और प्रेरक प्रसंग जीवन को सही दिशा देते हैं।
संचालन वैभव सोमवंशी ने किया। इस दौरान डॉ. राजेश हजेला, निमिष टंडन, संजय गर्ग, महेश पाल सिंह, गुंजा जैन, प्रीति रायजादा, आलोक रायजादा, प्रियांशु पांडेय, अरविंद दीक्षित आदि मौजूद रहे।