फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Gonda News ›   Seeing the marks of the bullets that hit my legs fills me with pride

Gonda News: पैर में लगी गोलियों के निशान देख होता है गर्व

Sat, 25 Jul 2026 11:46 PM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा
संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा Updated Sat, 25 Jul 2026 11:46 PM IST
विज्ञापन
Seeing the marks of the bullets that hit my legs fills me with pride
विजय सिंह।
गोंडा। कारगिल युद्ध के दौरान वर्ष 1999 में बर्फ से ढकी चोटियों पर भारतीय सेना और दुश्मन के बीच भीषण संघर्ष चल रहा था। इसी युद्ध में गोंडा के वीर सपूत विजय सिंह ने अदम्य साहस और वीरता का परिचय दिया।
विज्ञापन


दाहिने पैर में गोली लगने के बावजूद उन्होंने मोर्चा नहीं छोड़ा और करीब 14 घंटे तक घायल अवस्था में दुश्मन का सामना करते रहे। उनके इसी जज्बे और बहादुरी के कारण आज लोग उन्हें विजय कारगिल के नाम से जानते हैं।
विज्ञापन


बेलसर ब्लॉक के ऐली परसौली गांव के मूल निवासी व वर्तमान में सिविल लाइंस निवासी विजय सिंह सेना की 16 ग्रेनेडियर्स रेजीमेंट में नायक के पद पर तैनात थे। एमएमजी, एजीएल और एके-47 जैसे आधुनिक हथियारों के प्रशिक्षित विजय सिंह को उनकी यूनिट के साथ कारगिल के दरास सेक्टर भेजा गया था।
विज्ञापन
विज्ञापन


यह क्षेत्र टाइगर हिल के सामने स्थित था, जहां युद्ध के सबसे भीषण और निर्णायक मुकाबले हुए। नौ जून 1999 को कमांडिंग ऑफिसर व दलनायक मेजर अजीत सिंह के नेतृत्व में विजय सिंह की टुकड़ी को मोर्चे पर भेजा गया। दरास सेक्टर में नक्शों के माध्यम से जवानों को दुश्मन की भौगोलिक स्थिति की जानकारी दी गई। करीब एक माह तक चले युद्ध में यूनिट के 12 जवान शहीद हुए, जबकि 22 सैनिक घायल हुए।

निर्णायक लड़ाई 5100 नंबर की पहाड़ी पर लड़ी जा रही थी, जहां विजय सिंह अपने साथियों के साथ आगे बढ़ते हुए दुश्मनों पर जवाबी फायरिंग कर रहे थे।उनके साथ कवर फायर की जिम्मेदारी निभा रहे प्रयागराज निवासी जवान अमर बहादुर भी मोर्चे पर डटे थे।

इसी दौरान विजय सिंह के दाहिने पैर में दुश्मन की गोली लगी। उन्हें इसका एहसास तब हुआ जब पैर से खून बहने लगा, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और फायरिंग जारी रखी। कुछ ही देर बाद दुश्मन की जवाबी कार्रवाई में अमर बहादुर शहीद हो गए।


गोली लगने के बाद विजय सिंह करीब 14 घंटे तक युद्ध क्षेत्र में घायल अवस्था में पड़े रहे। उनके मन में एक ही संकल्प था कि यदि दुश्मन सामने आया तो वह अंतिम सांस तक ग्रेनेड से हमला करेंगे, चाहे इसके लिए उन्हें सर्वोच्च बलिदान ही क्यों न देना पड़े। बाद में भारतीय सेना के जवानों ने उन्हें सुरक्षित निकालकर अस्पताल पहुंचाया। यह वीरगाथा आज भी देशभक्ति, साहस और कर्तव्यनिष्ठा का प्रेरणादायक उदाहरण मानी जाती है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed