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Hamirpur News: सर्जन की लापरवाही से एक घंटे तड़पी गर्भवती
संवाद न्यूज एजेंसी, हमीरपुर
Updated Wed, 18 Mar 2026 12:12 AM IST
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हमीरपुर। डॉक्टरों पर लोग आंख बंदकर विश्वास करते हैं। इसके बावजूद भी कुछ ऐसा हो जाता है जिसमें मरीज को असहनीय तकलीफ से गुजरना पड़ता है। ऐसा ही कारनामा सोमवार को जिला महिला अस्पताल में हुआ। एक डॉक्टर दर्द से पीड़ित गर्भवती का ऑपरेशन के लिए चयन करता है और दूसरा डॉक्टर संबंधित चिकित्सक की गैर मौजूदगी में मरीज को अल्ट्रासाउंड के लिए निजी पैथोलॉजी भेज देता है। इस घटना से आहत होकर उस चिकित्सक ने सीएमएस को लिखित पत्र लिखकर अन्य सर्जन के पूर्व निर्धारित प्रक्रियाओं को दूसरा सर्जन प्रभावित न करने की मांग की है।
जिला महिला अस्पताल इन दिनों गुटबाजी का शिकार है। इसी कारण सोमवार को एक गर्भवती की जान पर बन आई। अस्पताल के सर्जन डॉ. अखिलेश मिश्रा ने सीएमएस को दिए पत्र में शिकायत की है कि सोमवार सुबह आठ बजे वह ऑनकाल थे। तभी प्रसूता अंजलि का चयन उन्होंने ऑपरेशन के लिए किया और जांच के लिए स्टाफ नर्सों को निर्देशित किया।
इसी दौरान दुर्भावना से प्रेरित होकर दूसरे सर्जन डॉ. लालमणि ने अनावश्यक रूप से प्रसूता को अल्ट्रासाउंड के लिए बाहर भेज दिया। इससे प्रसूता को न सिर्फ आर्थिक क्षति हुई बल्कि उसे शारीरिक पीड़ा का भी सामना करना पड़ा। साथ ही यदि मार्ग में कोई चिकित्सकीय जटिल समस्या उत्पन्न होती तो ऐसी स्थिति में संस्थान की छवि भी खराब हो सकती है।
डॉ. मिश्रा ने अस्पताल में गुटबाजी का आरोप लगाते हुए कहा कि गर्भवती को धक्के मारकर डिलीवरी कराई जा रही है। इससे अक्सर मौतें हो रही हैं। उन्होंने सीएमएस से अनुरोध किया कि अन्य सर्जन के पूर्व निर्धारित प्रक्रियाओं को दूसरा सर्जन प्रभावित न करें। जब तक कि कोई विशेष चिकित्सकीय कारण न हो। साथ ही संबंधित चिकित्सक नियमानुसार ही चिकित्सा परिसर में उपस्थित होने की मांग की है।
अल्ट्रासाउंड के कारण 40-50 मिनट सहना पड़ा दर्द
गर्भवती के पति शिवम ने बताया कि काउंटर में बैठे डॉक्टर ने अल्ट्रासाउंड के लिए लिखा और दूसरे डॉक्टर ने सीधे ऑपरेशन के लिए सुझाव दिए। पहली डिलीवरी होने व केस बिगड़ने के कारण ऑपरेशन के अलावा दूसरा कोई विकल्प भी नहीं था। लेकिन, डॉक्टर के कहने पर उसे पत्नी को पैदल 300 मीटर लेकर जांच कराने के लिए निजी पैथोलॉजी में जाना पड़ा। इसमें करीब 40-50 मिनट समय बर्बाद हुआ और पत्नी को अलग दर्द से गुजरना पड़ा। जिन्होंने ऑपरेशन किया है, वह डॉक्टर बहुत अच्छे हैं। जच्चा-बच्चा दोनों सुरक्षित हैं।
बीते तीन माह में 16 शिशुओं की मौत
महिला अस्पताल में संचालित 12 बेड का एसएनसीयू वार्ड में हर माह 60 से 70 बच्चे भर्ती हो रहे हैं। बीते तीन माह के मिले आंकड़ों के अनुसार, 21 दिसंबर 2025 से 20 जनवरी 2026 तक कुल 61 शिशु भर्ती किए गए। इनमें आठ की मौत हो गईं। इसी प्रकार 21 जनवरी से 20 फरवरी तक 68 भर्ती व पांच की मौत और 21 फरवरी से 17 मार्च तक 46 भर्ती और तीन शिशुओं की मौतें हो चुकी हैं। इनमें करीब 20 फीसदी रेफर कर दिए जाते हैं।
9.4 फीसदी मृत्युदर
एसएनसीयू वार्ड प्रभारी व बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. राजीव शाक्य ने बताया कि प्रदेश स्तरीय रैंकिंग के अनुसार जिले की साढ़े सात फीसदी मृत्युदर है। बीते तीन माह में उपचार के दौरान 16 शिशुओं की मौत हुई हैं। जो करीब 9.4 फीसदी है।
बाहरी महिलाएं भी रहतीं सक्रिय
जिला महिला अस्पताल में बाहरी महिलाओं का भी बड़ा सिंडिकेट है। चार से पांच महिलाएं यहां 24 घंटे सक्रिय रहती हैं। मरीजों को अच्छा इलाज दिलाए जाने का प्रलोभन देकर निजी अस्पतालों में भर्ती कराती हैं। साथ ही जांचों के नाम पर इनसे पैसे भी ऐंठे जाते हैं। महिला अस्पताल प्रशासन को इसकी जानकारी होने के बावजूद भी इन पर प्रतिबंध लगाए जाने की कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है।
हर माह 250-300 होती डिलीवरी
जिला महिला अस्पताल से मिले आंकड़ों के अनुसार, हर माह करीब 250 से 300 डिलीवरी होती हैं। अप्रैल 2025 से लेकर फरवरी 2026 तक कुल 2,758 प्रसूताओं की डिलीवरी की गईं। इनमें बीते जनवरी माह में 314 फरवरी में 273 डिलीवरी कराई गई हैं।
मामले की शिकायत डॉ. मिश्रा ने की है। गुटबाजी का आरोप निराधार है। चिकित्सकों को आपसी तालमेल बनाकर कार्य करना होगा। जरूरी होने पर ही मरीजों को जांच के लिए भेजा जाए। अराजकतत्वों पर नजर रखी जाएगी।
डॉ. केएस मिश्रा, सीएमएस जिला महिला अस्पताल।
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जिला महिला अस्पताल इन दिनों गुटबाजी का शिकार है। इसी कारण सोमवार को एक गर्भवती की जान पर बन आई। अस्पताल के सर्जन डॉ. अखिलेश मिश्रा ने सीएमएस को दिए पत्र में शिकायत की है कि सोमवार सुबह आठ बजे वह ऑनकाल थे। तभी प्रसूता अंजलि का चयन उन्होंने ऑपरेशन के लिए किया और जांच के लिए स्टाफ नर्सों को निर्देशित किया।
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इसी दौरान दुर्भावना से प्रेरित होकर दूसरे सर्जन डॉ. लालमणि ने अनावश्यक रूप से प्रसूता को अल्ट्रासाउंड के लिए बाहर भेज दिया। इससे प्रसूता को न सिर्फ आर्थिक क्षति हुई बल्कि उसे शारीरिक पीड़ा का भी सामना करना पड़ा। साथ ही यदि मार्ग में कोई चिकित्सकीय जटिल समस्या उत्पन्न होती तो ऐसी स्थिति में संस्थान की छवि भी खराब हो सकती है।
डॉ. मिश्रा ने अस्पताल में गुटबाजी का आरोप लगाते हुए कहा कि गर्भवती को धक्के मारकर डिलीवरी कराई जा रही है। इससे अक्सर मौतें हो रही हैं। उन्होंने सीएमएस से अनुरोध किया कि अन्य सर्जन के पूर्व निर्धारित प्रक्रियाओं को दूसरा सर्जन प्रभावित न करें। जब तक कि कोई विशेष चिकित्सकीय कारण न हो। साथ ही संबंधित चिकित्सक नियमानुसार ही चिकित्सा परिसर में उपस्थित होने की मांग की है।
अल्ट्रासाउंड के कारण 40-50 मिनट सहना पड़ा दर्द
गर्भवती के पति शिवम ने बताया कि काउंटर में बैठे डॉक्टर ने अल्ट्रासाउंड के लिए लिखा और दूसरे डॉक्टर ने सीधे ऑपरेशन के लिए सुझाव दिए। पहली डिलीवरी होने व केस बिगड़ने के कारण ऑपरेशन के अलावा दूसरा कोई विकल्प भी नहीं था। लेकिन, डॉक्टर के कहने पर उसे पत्नी को पैदल 300 मीटर लेकर जांच कराने के लिए निजी पैथोलॉजी में जाना पड़ा। इसमें करीब 40-50 मिनट समय बर्बाद हुआ और पत्नी को अलग दर्द से गुजरना पड़ा। जिन्होंने ऑपरेशन किया है, वह डॉक्टर बहुत अच्छे हैं। जच्चा-बच्चा दोनों सुरक्षित हैं।
बीते तीन माह में 16 शिशुओं की मौत
महिला अस्पताल में संचालित 12 बेड का एसएनसीयू वार्ड में हर माह 60 से 70 बच्चे भर्ती हो रहे हैं। बीते तीन माह के मिले आंकड़ों के अनुसार, 21 दिसंबर 2025 से 20 जनवरी 2026 तक कुल 61 शिशु भर्ती किए गए। इनमें आठ की मौत हो गईं। इसी प्रकार 21 जनवरी से 20 फरवरी तक 68 भर्ती व पांच की मौत और 21 फरवरी से 17 मार्च तक 46 भर्ती और तीन शिशुओं की मौतें हो चुकी हैं। इनमें करीब 20 फीसदी रेफर कर दिए जाते हैं।
9.4 फीसदी मृत्युदर
एसएनसीयू वार्ड प्रभारी व बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. राजीव शाक्य ने बताया कि प्रदेश स्तरीय रैंकिंग के अनुसार जिले की साढ़े सात फीसदी मृत्युदर है। बीते तीन माह में उपचार के दौरान 16 शिशुओं की मौत हुई हैं। जो करीब 9.4 फीसदी है।
बाहरी महिलाएं भी रहतीं सक्रिय
जिला महिला अस्पताल में बाहरी महिलाओं का भी बड़ा सिंडिकेट है। चार से पांच महिलाएं यहां 24 घंटे सक्रिय रहती हैं। मरीजों को अच्छा इलाज दिलाए जाने का प्रलोभन देकर निजी अस्पतालों में भर्ती कराती हैं। साथ ही जांचों के नाम पर इनसे पैसे भी ऐंठे जाते हैं। महिला अस्पताल प्रशासन को इसकी जानकारी होने के बावजूद भी इन पर प्रतिबंध लगाए जाने की कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है।
हर माह 250-300 होती डिलीवरी
जिला महिला अस्पताल से मिले आंकड़ों के अनुसार, हर माह करीब 250 से 300 डिलीवरी होती हैं। अप्रैल 2025 से लेकर फरवरी 2026 तक कुल 2,758 प्रसूताओं की डिलीवरी की गईं। इनमें बीते जनवरी माह में 314 फरवरी में 273 डिलीवरी कराई गई हैं।
मामले की शिकायत डॉ. मिश्रा ने की है। गुटबाजी का आरोप निराधार है। चिकित्सकों को आपसी तालमेल बनाकर कार्य करना होगा। जरूरी होने पर ही मरीजों को जांच के लिए भेजा जाए। अराजकतत्वों पर नजर रखी जाएगी।
डॉ. केएस मिश्रा, सीएमएस जिला महिला अस्पताल।