{"_id":"6a6d9e9ae16678cf65068a1d","slug":"friendship-close-to-heart-2026-08-01","type":"story","status":"publish","title_hn":"Friendship: शादी के बाद जिम्मेदारियां बढ़ीं, मुलाकातें घटीं, लेकिन बचपन की दोस्ती आज भी दिल के सबसे करीब","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Friendship: शादी के बाद जिम्मेदारियां बढ़ीं, मुलाकातें घटीं, लेकिन बचपन की दोस्ती आज भी दिल के सबसे करीब
Sat, 01 Aug 2026 12:52 PM IST
Chaman Kumar Sharma
अमर उजाला नेटवर्क, हाथरस
अमर उजाला नेटवर्क, हाथरस
Published by: Chaman Kumar Sharma
Updated Sat, 01 Aug 2026 12:52 PM IST
सार
समय के साथ अब स्कूल-कॉलेज के दिनों में हर खुशी, हर राज और हर शरारत की साथी रहने वाली सहेलियां शादी के बाद धीरे-धीरे फोन और वीडियो कॉल तक सिमट गई हैं।
विज्ञापन
प्रभा वार्ष्णेय व पूजा वार्ष्णेय
- फोटो : संवाद
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
स्कूल की घंटी, कॉलेज की कैंटीन, मोहल्ले की गलियां और घंटों चलने वाली बातें। यही बचपन की दोस्ती की सबसे खूबसूरत पहचान होती है। शादी के बाद जीवन की रफ्तार बदल जाती है, लेकिन सहेलियों से जुड़े ये पल उम्रभर यादों में महकते रहते हैं। राष्ट्रीय गर्लफ्रेंड दिवस पर महिलाओं ने बताया कि आज भी पुरानी सहेलियों से मिलते ही वक्त जैसे ठहर जाता है।
विज्ञापन
हर वर्ष एक अगस्त को यह दिवस मनाया जाता है। यह दिन प्रेमी-प्रेमिका से नहीं, बल्कि महिलाओं की अपनी पक्की सहेलियों से जुड़ा है। इस दिन वे अपनी सहेलियों के साथ जश्न मनाती हैं। आसान शब्दों में कहें तो यह शक्ति और समर्थन का दिवस है। इसे ऐसे समझ सकते हैं कि प्राचीन ग्रीस में महिलाओं की दोस्ती धार्मिक और सामाजिक जीवन में अहम भूमिका निभाती थी। तब महिलाओं ने डेमेटर और पर्सेफोन को सम्मानित करने वाले उत्सव थेस्मोफोरिया में भाग लिया, जिसने उन्हें पुरुष-प्रधान स्थानों से दूर एक-दूसरे से जुड़ने का अवसर प्रदान किया था।
विज्ञापन
समय के साथ अब स्कूल-कॉलेज के दिनों में हर खुशी, हर राज और हर शरारत की साथी रहने वाली सहेलियां शादी के बाद धीरे-धीरे फोन और वीडियो कॉल तक सिमट गई हैं। व्हाट्सएप और सोशल मीडिया ने बातचीत आसान कर दी है, लेकिन साथ बैठकर घंटों गप्पें मारने और बेवजह हंसने की खुशी अब भी किसी तकनीक से पूरी नहीं हो सकी है।
विज्ञापन
हाथरस की महिलाओं का कहना है कि रक्षाबंधन, भाईदूज या मायके में किसी शादी-ब्याह के दौरान ही वर्षों बाद सहेलियों से मुलाकात हो पाती है। तब ऐसा लगता है, जैसे वक्त ठहर गया हो और बचपन फिर से लौट आया हो। नए रिश्ते और नए दोस्त जरूर बनते हैं, लेकिन बचपन की सहेलियों जैसा अपनापन और निस्वार्थ साथ जिंदगी भर नहीं भूलता।
नए दोस्त मिले, लेकिन सहेलियां आज भी सबसे खास
शादी के बाद जिम्मेदारियों में वक्त निकल गया। अब राखी या भाईदूज पर मायके जाती हूं, तभी पुरानी सहेलियों से मुलाकात होती है। उनसे मिलकर लगता है जैसे बचपन फिर लौट आया हो।- पूजा वार्ष्णेय, हाथरस
सहेलियों से मिलने के लिए तलाशती हूं बहाने
फोन पर बात हो जाती है, लेकिन सामने बैठकर मिलने की खुशी अलग होती है। अब किसी शादी या पारिवारिक कार्यक्रम के बहाने ही सहेलियों से मिलना हो पाता है। - प्रभा वार्ष्णेय, हाथरस