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Hathras News: सेहत में सुधार की योजनाओं पर संसाधनों का संकट
संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस
Updated Tue, 07 Apr 2026 02:58 AM IST
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बागला संयुक्त जिला चिकित्सालय। संवाद
- फोटो : Samvad
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स्वास्थ्य के लिए एकजुट, विज्ञान के साथ खड़े रहें, थीम के साथ आज जब पूरी दुनिया विश्व स्वास्थ्य दिवस मना रही है और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का संकल्प ले रही है, वहीं जिले में स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर मिली-जुली नजर आती है। एक ओर जहां सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाएं धरातल पर जंग जीतने की कवायद कर रही हैं, वहीं बुनियादी संसाधनों का अभाव और प्रशासनिक अड़चनें आम आदमी की सेहत पर भारी पड़ रही हैं।
हाथरस में स्वास्थ्य सेवाओं के कायाकल्प के लिए प्रस्तावित मेडिकल कॉलेज का मामला लंबे समय से लटका हुआ है। सबसे बड़ी बाधा जमीन उपलब्ध न हो पाना है। इस कारण प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ पा रहा है, जिसका सीधा असर जिले की चिकित्सा व्यवस्था पर पड़ रहा है।
मेडिकल कॉलेज के लिए सासनी में पराग डेयरी की जमीन निश्चत हो चुकी है, लेकिन जमीन हस्तांतरण की प्रक्रिया शासन में अटकी है। डीएम की ओर से कई बार रिमांइडर भी भेजा जा चुका है।
18 साल से वही भवन, जगह पड़ रही कम
बागला संयुक्त जिला चिकित्सालय का वर्तमान भवन वर्ष मई 2008 में बनकर तैयार हुआ था। 100 बेड के इस अस्पताल में 70 बेड पुरुष और 30 महिला अस्पताल के लिए निर्धारित किए गए थे। तब से स्थिति जस की तस है। मरीजों की संख्या तीन गुना हो चुकी है। ओपीडी में रोजाना ढाई से तीन हजार मरीज पहुंचते हैं। वहीं महिला अस्पताल की आईपीडी भी रोजाना 20 से अधिक है। ऐसे में प्रसूताओं को 24 घंटे में छुट्टी देनी पड़ती है। यहां से महिला अस्पताल को शिफ्ट करने का प्रस्ताव रखा गया है, जिस पर अभी विचार चल रहा है।
चिकित्सकों की कमी झेल रहे मरीज
जिला अस्पताल, टीबी अस्पताल से लेकर ग्रामीण क्षेत्र तक मरीज चिकित्सकों की कमी से जूझ रहे हैं। जिला अस्पताल में 25 चिकित्सकों के सापेक्ष मात्र 12 चिकित्सक हैं। यहां कार्डियोलॉजिस्ट, चेस्ट फिजीशियन, एनेस्थेसियोलॉजिस्ट, सर्जन व ओटी तकनीशियन की तैनाती नहीं है। विभिन्न जांचें उपलब्ध हैं, लेकिन पैथोलॉजिस्ट नहीं है। एकमात्र रेडियोलॉजिस्ट के भरोसे अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे व सीटी स्कैन सेवाएं चल रही हैं। टीबी अस्पताल में सीएमएस ही तैनात नहीं हैं। ओपीडी के लिए एक चिकित्सक है। स्टाफ व चिकित्सक न होने से यहां कोरोना के बाद से मरीजों को भर्ती नहीं किया जाता।
ग्रामीण क्षेत्र की बात करें तो सीएमओ के अंडर 116 स्थायी चिकित्सकों के सापेक्ष मात्र 48 चिकित्सक हैं। एनएचएम के जरिये 40 एमबीबीएस चिकित्सक हैं, जो सीएचसी के अलावा अन्य कार्यक्रमों में लगे हुए हैं। 164 जन आरोग्य मंदिर स्वास्थ्य केंद्रों में से मात्र 148 पर ही सीएचओ हैं। एक-एक स्टाफ की तैनाती के कारण इनमें से अधिकतर आए दिन बंद रहते हैं।
योजनाएं दे रही हैं उम्मीद की किरण
संसाधनों की कमी के बावजूद स्वास्थ्य विभाग विभिन्न सरकारी योजनाओं के जरिये स्थिति सुधारने के प्रयास में जुटा है।
-आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन : डिजिटल हेल्थ रिकॉर्ड्स के जरिये मरीजों के उपचार को सुगम बनाने की कोशिश जारी है।
-टीबी मुक्त अभियान : जिले को क्षय रोग से मुक्त करने के लिए घर-घर स्क्रीनिंग और निक्षय मित्र योजना के तहत मरीजों को गोद लेने का अभियान तेज किया गया है। हाल ही में अभियान में 68 ग्राम पंचायतों को टीबी मुक्त घोषित किया गया है, जिनमें से दो पंचायत दो सालों से टीबी मुक्त है। वर्तमान में जिले में 3680 टीबी के मरीज हैं, जिन्हें नियमित दवाएं दी जा रही हैं।
टीकाकरण व आयरन सूक्रोज : मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए नियमित टीकाकरण, आयरन सूक्रोज सप्ताह, राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) का सहारा लिया जा रहा है। दिसंबर से चले आयरन सूक्रोज सप्ताह के तहत 2948 में से 966 महिलाओं में हीमोग्लोबिन का स्तर सात से उठकर 10 ग्राम प्रति डेसिलीटर से ऊपर पहुंच गया।
राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम : इसमें एनएचएम के 30 चिकित्सकों की मोबाइल टीम आउटरीच स्क्रीनिंग करती है। इसमें जन्म से 18 वर्ष तक के बच्चों में जन्मजात दोषों, कमियों, बीमारियों और दिव्यांगता सहित विकास में देरी से संबंधित कारणों की पहचान कर उनके निदान का प्रयास किया जाता है।
स्वास्थ्य विभाग सीमित संसाधनों में बेहतर सेवाएं देने का प्रयास कर रहा है। आयरन सूक्रोज सप्ताह, टीकाकरण और टीबी उन्मूलन में हमने प्रगति की है। मेडिकल कॉलेज और अन्य बुनियादी ढांचों के लिए उच्च स्तर पर पत्राचार जारी है।
-डाॅ. राजीव गुप्ता, एसीएमओ
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हाथरस में स्वास्थ्य सेवाओं के कायाकल्प के लिए प्रस्तावित मेडिकल कॉलेज का मामला लंबे समय से लटका हुआ है। सबसे बड़ी बाधा जमीन उपलब्ध न हो पाना है। इस कारण प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ पा रहा है, जिसका सीधा असर जिले की चिकित्सा व्यवस्था पर पड़ रहा है।
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मेडिकल कॉलेज के लिए सासनी में पराग डेयरी की जमीन निश्चत हो चुकी है, लेकिन जमीन हस्तांतरण की प्रक्रिया शासन में अटकी है। डीएम की ओर से कई बार रिमांइडर भी भेजा जा चुका है।
18 साल से वही भवन, जगह पड़ रही कम
बागला संयुक्त जिला चिकित्सालय का वर्तमान भवन वर्ष मई 2008 में बनकर तैयार हुआ था। 100 बेड के इस अस्पताल में 70 बेड पुरुष और 30 महिला अस्पताल के लिए निर्धारित किए गए थे। तब से स्थिति जस की तस है। मरीजों की संख्या तीन गुना हो चुकी है। ओपीडी में रोजाना ढाई से तीन हजार मरीज पहुंचते हैं। वहीं महिला अस्पताल की आईपीडी भी रोजाना 20 से अधिक है। ऐसे में प्रसूताओं को 24 घंटे में छुट्टी देनी पड़ती है। यहां से महिला अस्पताल को शिफ्ट करने का प्रस्ताव रखा गया है, जिस पर अभी विचार चल रहा है।
चिकित्सकों की कमी झेल रहे मरीज
जिला अस्पताल, टीबी अस्पताल से लेकर ग्रामीण क्षेत्र तक मरीज चिकित्सकों की कमी से जूझ रहे हैं। जिला अस्पताल में 25 चिकित्सकों के सापेक्ष मात्र 12 चिकित्सक हैं। यहां कार्डियोलॉजिस्ट, चेस्ट फिजीशियन, एनेस्थेसियोलॉजिस्ट, सर्जन व ओटी तकनीशियन की तैनाती नहीं है। विभिन्न जांचें उपलब्ध हैं, लेकिन पैथोलॉजिस्ट नहीं है। एकमात्र रेडियोलॉजिस्ट के भरोसे अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे व सीटी स्कैन सेवाएं चल रही हैं। टीबी अस्पताल में सीएमएस ही तैनात नहीं हैं। ओपीडी के लिए एक चिकित्सक है। स्टाफ व चिकित्सक न होने से यहां कोरोना के बाद से मरीजों को भर्ती नहीं किया जाता।
ग्रामीण क्षेत्र की बात करें तो सीएमओ के अंडर 116 स्थायी चिकित्सकों के सापेक्ष मात्र 48 चिकित्सक हैं। एनएचएम के जरिये 40 एमबीबीएस चिकित्सक हैं, जो सीएचसी के अलावा अन्य कार्यक्रमों में लगे हुए हैं। 164 जन आरोग्य मंदिर स्वास्थ्य केंद्रों में से मात्र 148 पर ही सीएचओ हैं। एक-एक स्टाफ की तैनाती के कारण इनमें से अधिकतर आए दिन बंद रहते हैं।
योजनाएं दे रही हैं उम्मीद की किरण
संसाधनों की कमी के बावजूद स्वास्थ्य विभाग विभिन्न सरकारी योजनाओं के जरिये स्थिति सुधारने के प्रयास में जुटा है।
-आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन : डिजिटल हेल्थ रिकॉर्ड्स के जरिये मरीजों के उपचार को सुगम बनाने की कोशिश जारी है।
-टीबी मुक्त अभियान : जिले को क्षय रोग से मुक्त करने के लिए घर-घर स्क्रीनिंग और निक्षय मित्र योजना के तहत मरीजों को गोद लेने का अभियान तेज किया गया है। हाल ही में अभियान में 68 ग्राम पंचायतों को टीबी मुक्त घोषित किया गया है, जिनमें से दो पंचायत दो सालों से टीबी मुक्त है। वर्तमान में जिले में 3680 टीबी के मरीज हैं, जिन्हें नियमित दवाएं दी जा रही हैं।
टीकाकरण व आयरन सूक्रोज : मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए नियमित टीकाकरण, आयरन सूक्रोज सप्ताह, राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) का सहारा लिया जा रहा है। दिसंबर से चले आयरन सूक्रोज सप्ताह के तहत 2948 में से 966 महिलाओं में हीमोग्लोबिन का स्तर सात से उठकर 10 ग्राम प्रति डेसिलीटर से ऊपर पहुंच गया।
राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम : इसमें एनएचएम के 30 चिकित्सकों की मोबाइल टीम आउटरीच स्क्रीनिंग करती है। इसमें जन्म से 18 वर्ष तक के बच्चों में जन्मजात दोषों, कमियों, बीमारियों और दिव्यांगता सहित विकास में देरी से संबंधित कारणों की पहचान कर उनके निदान का प्रयास किया जाता है।
स्वास्थ्य विभाग सीमित संसाधनों में बेहतर सेवाएं देने का प्रयास कर रहा है। आयरन सूक्रोज सप्ताह, टीकाकरण और टीबी उन्मूलन में हमने प्रगति की है। मेडिकल कॉलेज और अन्य बुनियादी ढांचों के लिए उच्च स्तर पर पत्राचार जारी है।
-डाॅ. राजीव गुप्ता, एसीएमओ