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Jalaun News: बार एसोसिएशन के आरोपों पर रिंकू सिंह ने सौंपा जवाब
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उरई। सदर तहसील में उप जिलाधिकारी (न्यायिक) एवं आईएएस अधिकारी रिंकू सिंह राही और डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन जालौन के बीच चल रहा विवाद अब जनपद अधिवक्ता शिकायत निवारण समिति तक पहुंच गया है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के निर्देश पर गठित समिति के समक्ष एसडीएम न्यायिक ने अपना विस्तृत पक्ष प्रस्तुत किया है।
अपने अभ्यावेदन में रिंकू सिंह राही ने कहा है कि अधिवक्ताओं द्वारा किया जा रहा न्यायिक कार्यों का बहिष्कार अनुचित है। इससे आम वादकारियों को समय पर न्याय मिलने में बाधा उत्पन्न हो रही है। उन्होंने समिति से मामले की निष्पक्ष जांच उपलब्ध अभिलेखों और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर कराने का अनुरोध किया है।
उन्होंने बताया कि न्यायालय की कार्यप्रणाली को अधिक पारदर्शी, समयबद्ध और वादकारी-केंद्रित बनाने के उद्देश्य से कई सुधारात्मक कदम उठाए गए हैं। इनमें मुकदमों का समय पर पंजीकरण, अनावश्यक स्थगन (तारीख) पर रोक, खुले न्यायालय में आदेश सुनाना तथा पूरी अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं।
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एसडीएम न्यायिक ने अपने पक्ष में उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का भी हवाला देते हुए कहा कि अधिवक्ताओं को न्यायालयों का बहिष्कार करने का विधिक अधिकार नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि जांच में उनकी ओर से किसी प्रकार की विधिक त्रुटि पाई जाती है तो वह आवश्यक सुधारात्मक कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार हैं। साथ ही समिति से आम वादकारियों के हितों को देखते हुए कार्य बहिष्कार समाप्त कराने की भी अपील की है।
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अपने अभ्यावेदन में रिंकू सिंह राही ने कहा है कि अधिवक्ताओं द्वारा किया जा रहा न्यायिक कार्यों का बहिष्कार अनुचित है। इससे आम वादकारियों को समय पर न्याय मिलने में बाधा उत्पन्न हो रही है। उन्होंने समिति से मामले की निष्पक्ष जांच उपलब्ध अभिलेखों और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर कराने का अनुरोध किया है।
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उन्होंने बताया कि न्यायालय की कार्यप्रणाली को अधिक पारदर्शी, समयबद्ध और वादकारी-केंद्रित बनाने के उद्देश्य से कई सुधारात्मक कदम उठाए गए हैं। इनमें मुकदमों का समय पर पंजीकरण, अनावश्यक स्थगन (तारीख) पर रोक, खुले न्यायालय में आदेश सुनाना तथा पूरी अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं।
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एसडीएम न्यायिक ने अपने पक्ष में उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का भी हवाला देते हुए कहा कि अधिवक्ताओं को न्यायालयों का बहिष्कार करने का विधिक अधिकार नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि जांच में उनकी ओर से किसी प्रकार की विधिक त्रुटि पाई जाती है तो वह आवश्यक सुधारात्मक कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार हैं। साथ ही समिति से आम वादकारियों के हितों को देखते हुए कार्य बहिष्कार समाप्त कराने की भी अपील की है।