उपलब्धि: रीढ़ की C1-C2 हड्डी के बीच फंसी धमनी का सफल ऑपरेशन, गर्दन की गतिशीलता रहेगी बरकरार, GSVM का कमाल
Kanpur News: कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज ने गर्दन की सी-1 व सी-2 हड्डियों के बीच फंसी धमनी को सुरक्षित हटाने की नई तकनीक विकसित कर उन्नाव की महिला का 13वां सफल ऑपरेशन किया है, जिससे गर्दन की गतिशीलता बनी रहेगी।
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कानपुर में जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के न्यूरो सर्जरी विभाग ने ऐसी सर्जिकल तकनीक विकसित की है जिसमें गर्दन की हड्डियों सी-1 व सी-2 के टूटने या अपनी जगह से खिसकने के साथ ही उनके जोड़ में आर्टरी फंसी होने पर भी सफलतापूर्वक ऑपरेशन किया जाता है। सोमवार को इस तकनीक से आर्टरी को अपनी जगह से हटाकर मरीज की गर्दन की हड्डियों को सफलतापूर्वक जोड़ा गया, जिसमें उसकी गर्दन गतिशीलता पूरी तरह से बरकरार रहेगी।
दावा है कि देश के अन्य उच्च चिकित्सा संस्थानों में गर्दन की हड्डियों (सी-1 व सी-2) के बीच आर्टरी फंसने के ऑपरेशन नहीं होते। वहां इस तरह के केस में गर्दन की हड्डी को सिर की हड्डी से जोड़ दिया जाता है, लेकिन इस विधा से ऑपरेशन के बाद गर्दन की गतिशीलता प्रभावित होती है। उन्नाव जिले की पुरवा तहसील के ग्राम मौरांवा निवासी राकेश कुमार की पत्नी संतोषी देवी (49) को आठ महीने पहले चोट लगी थी।
सी-1 और सी-2 अपनी जगह से खिसक गई
तब उनकी गर्दन (रीढ़) की पहली हड्डी सी-1 और दूसरी हड्डी सी-2 खिसक गई थी। तब से उसके हाथ-पैर नहीं चल रहे थे। 20 फरवरी को हैलट इमरजेंसी लाया गया। न्यूरो साइंसेज विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. मनीष सिंह की यूनिट में भर्ती कर इलाज शुरू हुआ। जांच में पता चला कि उनकी रीढ़ की सी-1 और सी-2 अपनी जगह से खिसक गई और उनके बीच में धमनी दबी है। सोमवार को डॉ. मनीष सिंह की देखरेख में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सौरभ सिंह और डॉ. अभिषेक गुप्ता ने संतोषी देवी का ऑपरेशन किया।
सी-1 और सी-2 वर्टिब्रा को स्क्रू लगाते हुए जोड़ा गया
डॉ. सौरभ सिंह ने बताया कि यह मामला बहुत जटिल था। ऑपरेशन के दौरान धमनी को माइक्रोस्कोप की मदद से हटाकर दूसरी जगह स्थापित किया गया। इसके बाद सी-1 और सी-2 वर्टिब्रा को स्क्रू लगाते हुए जोड़ा गया। ऑपरेशन विधायक कोटे से हुआ। डॉ. मनीष सिंह ने दावा किया कि उनके विभाग ने डेढ़ साल पहले इस तरह के ऑपरेशन की विधा ईजाद की है। यहां डेढ़ साल में इस तकनीक से सोमवार को 13वां ऑपरेशन सफलतापूर्वक किया गया। सभी ऑपरेशन सफल रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशन की तैयारी
विभागाध्यक्ष ने बताया कि इस तकनीक को अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित कराने की तैयारी की जा रही है। इसका उद्देश्य यह है कि दुनिया भर के अधिक से अधिक मरीज इस नवीन तकनीक से लाभान्वित हो सकें।