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UP: कानपुर का वो ‘बर्रा किडनी कांड', सात साल बाद भी तय नहीं हुए आरोप, जानें आखिर क्यों बच निकलते हैं डॉक्टर

आशीष अग्रवाल, अमर उजाला, Published by: Himanshu Awasthi Updated Thu, 02 Apr 2026 06:08 AM IST
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सार

Kanpur News: साल 2019 के बर्रा किडनी कांड में पुलिस की चार्जशीट के बावजूद सात साल से ट्रायल शुरू नहीं हो सका है। इस दौरान मुख्य गवाह महिला की मौत हो चुकी है और कई बड़े नाम कानूनी गलियारों से राहत पा चुके हैं।
 

Kanpurs Barra Kidney Scandal Charges Yet to Be Framed Even After Seven Years Why Doctors Ultimately Get Away
कानपुर का बर्रा किडनी कांड - फोटो : amar ujala
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विस्तार

कानपुर में सात साल पहले भी शहर का एक किडनी कांड चर्चा में रहा। एक महिला द्वारा बर्रा थाने में दर्ज कराई गई रिपोर्ट पर पुलिस ने विवेचना की तो कई बड़े खुलासे हुए। पुलिस ने तो 10 महीने में विवेचना पूरी कर 17 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट कोर्ट भेज दी थी, लेकिन न्यायिक व्यवस्था की कछुआ चाल कि गंभीर मामले में सात साल से अदालत में सिर्फ तारीख ही लग रही हैं।

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मुकदमे की सुनवाई शुरू होना, तो दूर अब तक कोर्ट में आरोपियों पर आरोप तक तय नहीं हो सके। किडनी कांड शहर के लिए नया नहीं है। आठ साल पहले भी फरवरी 2019 में शहर में किडनी कांड चर्चा में आया था। एक इलेक्ट्रीशियन की पत्नी ने बर्रा थाने में जबरन किडनी देने का दबाव बनाने वाले कुछ लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी।

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17 आरोपियों के खिलाफ तीन चार्जशीट कोर्ट में दाखिल कीं
घटना के तार दिल्ली के कई बड़े डॉक्टरों से भी जुड़े थे। हालांकि विवेचना के दौरान कोई ठोस सुबूत न मिलने के कारण सभी के नाम हट गए थे।  सिर्फ दिल्ली के पीएसआरआई हॉस्पिटल के पूर्व सीईओ डॉ. दीपक शुक्ला के खिलाफ ही पुलिस साक्ष्य जुटा पाई थी। इस मामले में पुलिस ने जांच-पड़ताल की और 17 आरोपियों के खिलाफ तीन चार्जशीट कोर्ट में दाखिल कीं।

अगली सुनवाई सीजेएम की कोर्ट में 27 अप्रैल को होनी है
फरवरी में रिपोर्ट दर्ज होने के बाद 10 महीने में ही पुलिस ने नवंबर तक तीनों चार्जशीट लगा दी थीं। इसमें से एक आरोपी को कोर्ट ने आरोप मुक्त कर दिया था, जिसके बाद 16 के खिलाफ मुकदमे की कार्रवाई चल रही है। कार्रवाई के नाम पर मुकदमे में सिर्फ तारीख ही पड़ती हैं। इस दौरान रिपोर्ट दर्ज कराने वाली महिला की मौत भी हो चुकी है। अगली सुनवाई सीजेएम की कोर्ट में 27 अप्रैल को होनी है।

महिला की किडनी निकालने के लिए दिया था नौकरी का झांसा
बांदा के बड़ी पिपरई निवासी संगीता देवी कश्यप जो साकेत नगर में रह रही थीं। उसने श्याम, मोहित निगम, जुनैद, राजू राय, करन व एक अज्ञात के खिलाफ बर्रा थाने में एक फरवरी 2019 को रिपोर्ट दर्ज कराई थी। कहा था कि बिजली का काम करने वाले उसके पति राजेश कुमार के दोस्त श्याम के माध्यम से राजेश की दोस्ती मोहित निगम से हुई। 25 नवंबर 2018 को मोहित ने जुनैद से राजेश को मिलवाया और संगीता की नौकरी लगवाने की बात कही। उसी रात जुनैद के साथ संगीता और राजेश गाजियाबाद चले गए।

संगीता ने थाने में रिपोर्ट लिखाई थी
वहां एक होटल में जुनैद ने राजेश को छोड़ा और संगीता को लेकर खून की जांच कराने अस्पताल ले गया। संगीता के पूछने पर कहा कि बड़े लोग किसी बीमार को काम पर नहीं रखते। संगीता ने जुनैद को किसी से किडनी बदलवाने की बात करते सुन लिया था। संगीता ने जब लौटने की जिद की तो जुनैद ने किडनी के बदले 40 लाख रुपये देने की बात कही। संगीता नहीं मानी और कानपुर लौट आई। एक दिन संगीता और राजेश को जुनैद ने बर्रा बाईपास के पास रोका और किडनी न देने पर दिल्ली आने-जाने और चेकअप कराने में खर्च हुए 50 हजार रुपये चुकाने का दबाव बनाया। तब संगीता ने थाने में रिपोर्ट लिखाई थी।

पहली चार्जशीट में थे 10 आरोपी
दस आरोपियों के खिलाफ 15 मई 2019 को पुलिस ने कोर्ट में पहली चार्जशीट दाखिल की थी। इनमें दिल्ली के साकेत निवासी टी. राजकुमार राव उर्फ राजू राय, लखीमपुर निवासी गौरव मिश्रा, हरदोई के प्रेमनगर निवासी शबूर अहमद, दिल्ली के जैतपुर निवासी शैलेश सक्सेना, पनकी के गंगागंज निवासी विक्की सिंह, लखनऊ के कश्मीरी मोहल्ला निवासी शमशाद अली, हमीरपुर के मौदहा निवासी गुलाम जुनैद अहमद खान, लखनऊ के चौक निवासी राजा उर्फ मो.उमर, जूही लाल काॅलोनी निवासी श्याम तिवारी, लखनऊ के हसनगंज निवासी रामू पांडे के नाम थे।

दूसरी चार्जशीट में थे पांच आरोपी
पांच आरोपियों के खिलाफ 15 सितंबर 2019 को पुलिस ने कोर्ट में दूसरी चार्जशीट दाखिल की थी। इनमें आजमगढ़ निवासी सिप्पू राय उर्फ नितेश, हनुमंत विहार निवासी मोहित निगम, हरियाणा की फरीदाबाद निवासी सोनिया डबास, केरल के मिथुन बीएस और दिल्ली के गोविंदपुरी निवासी सुनीता प्रभाकरन के नाम थे। दो आरोपियों के खिलाफ 27 नवंबर 2019 को पुलिस ने कोर्ट में तीसरी चार्जशीट दाखिल की थी। इनमें दिल्ली के डॉ. दीपक शुक्ला और अयोध्या के संजय पांडे के नाम थे।

पीएसआरआई के पूर्व सीईओ को किया था दोष मुक्त
दिल्ली के पीएसआरआई हॉस्पिटल के पूर्व सीईओ डॉ. दीपक शुक्ला के खिलाफ दाखिल चार्जशीट का कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए उन्हें सम्मन भेजा था जिसके खिलाफ डॉ. दीपक ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। हाईकोर्ट ने डॉ. दीपक के खिलाफ आईपीसी की धाराओं में तो मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी थी, जबकि मानव अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम की धाराओं में कोर्ट के प्रसंज्ञान आदेश को निरस्त कर दिया था।

फास्ट ट्रैक कोर्ट में चल रही है सुनवाई
हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ डॉ. दीपक सुप्रीम कोर्ट गए जहां से उन्हें कोई विशेष राहत नहीं मिल सकी। सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत में आरोप मुक्ति प्रार्थना पत्र देने को कहा था जिस पर डॉ. दीपक शुक्ला की ओर से प्रार्थना पत्र दिया गया। सीजेएम सूरज मिश्रा ने 11 मार्च 2025 को 28 पेज के अपने विस्तृत आदेश में डॉ. दीपक को दोष मुक्त कर दिया था। हालांकि अभियोजन ने इस आदेश के खिलाफ सेशन कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी थी। इसकी सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में चल रही है। अगली सुनवाई 16 अप्रैल को होनी है।

इसलिए बच निकलते हैं डॉक्टर
किडनी देने वाला और लेने वाला दोनों ही अपने-अपने फायदे के लिए लालच में किडनी प्रत्यारोपण की कार्रवाई में भाग लेते हैं। इसके लिए कुछ बाहरी व्यक्तियों का सहयोग लिया जाता है और अस्पताल जाने से पहले ही कूटरचित दस्तावेज तैयार कर लिए जाते हैं। किडनी प्रत्यारोपण के संबंध में बनी ऑथराइजेशन कमेटी में कागजात व दाता-ग्रहीता के जाने से पहले ही सारे अपराध हो जाते हैं। डॉक्टर को सिर्फ फीस लेकर ऑपरेशन करना होता है, इसलिए डॉक्टर इस अपराध में बच निकलते हैं।

एक माह में ही हो गई थी बहाली
प्रमुख सचिव स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, गवर्नमेंट ऑफ एनसीटी नई दिल्ली के 25 जुलाई 2019 के आदेश के तहत पीएसआरआई नई दिल्ली का किडनी प्रत्यारोपण का लाइसेंस भी तीन महीने के लिए निलंबित किया था। कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था हालांकि अस्पताल द्वारा भेजे गए नोटिस के जवाब से संतुष्ट होकर 16 अगस्त 2019 को लाइसेंस फिर बहाल कर दिया गया था।

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