UP: ‘बाहर से कुंडी, अंदर जलती चिता’, मासूम और पिता को जिंदा भस्म किया, 15 साल बाद गुनहगारों को सजा, पढ़ें मामला
Fatehpur News: गाजीपुर थाना क्षेत्र में वर्ष 2011 में पिता-पुत्र को घर में बंद कर जिंदा जलाने के बहुचर्चित मामले में अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है।
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कोठरी की कुंडी बाहर से बंद कर पिता-पुत्र को जिंदा जलाने के मामले में अदालत ने बहनोई-साले समेत तीन आरोपियों को दोषी करार दिया है। कोर्ट संख्या-द्वितीय के अपर सत्र न्यायाधीश पूजा विश्वकर्मा ने तीनों दोषियों को उम्रकैद और 45-45 हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई। सजा के बाद पीड़ित परिवार ने संतोष जताते हुए कहा कि उन्हें इंसाफ मिला लेकिन कई आरोपी अब भी छूट गए।
गाजीपुर थाना क्षेत्र के चक काजीपुर गांव निवासी सूर्यकली ने बताया कि मार्च 2011 में गांव के सुरेश विश्वकर्मा के परिवार की एक लड़की लापता हो गई थी। इस मामले में उनके परिवार के पिंटू पर शक जताया जा रहा था और लगातार पुलिस पर खोजबीन का दबाव बनाया जा रहा था।
10 मार्च 2011 की शाम करीब पांच बजे कृष्णपाल उर्फ नेता, रज्जू विश्वकर्मा, सुरेश विश्वकर्मा, हरछट्टी विश्वकर्मा, देशराज, नांद, रामराज विश्वकर्मा, होरीलाल, कालू और सुरेश विश्वकर्मा का साला राजेंद्र विश्वकर्मा निवासी तौफापुर थाना हुसैनगंज शाम करीब पांच बजे घर आए। लड़की न मिलने पर परिवार की हत्या की धमकी दी।
महिला ने बताया कि रात करीब आठ बजे तत्कालीन चौकी प्रभारी और तीन पुलिसकर्मियों के साथ जांच के लिए पुलिस भी मौके पर पहुंची और घर की तलाशी ली। आरोप है कि इस दौरान पुलिस ने गाली-गलौज भी की और लड़की नहीं मिलने पर परिवार को जेल भेजने की धमकी दी।
पुलिस के लौटने के बाद सुरेश विश्वकर्मा ने साथी रज्जू विश्वकर्मा, हरछट्टी विश्वकर्मा, देशराज, नांद, रामराज विश्वकर्मा, होरीलाल, कालू, राजेंद्र विश्वकर्मा संग पति लालता प्रसाद व बेटा अनिल को घेर लिया। बताया गया कि पति लालता प्रसाद दीक्षित और पुत्र अनिल जान बचाकर घर के अंदर छिप गए लेकिन आरोपियों ने बाहर से कुंडी बंद कर आग लगा दी।
आग में पूरा घर जल गया। पति की मौके पर ही मौत हो गई। पुत्र अनिल गंभीर रूप से झुलस गया और बाद में इलाज के दौरान उसकी भी मौत हो गई। घटना के बाद गांव में भगदड़ मच गई और पीड़िता मदद के लिए चिल्लाती रही लेकिन कोई सामने नहीं आया। कोर्ट ने कृष्णपाल, सुरेश व उसके साले राजेंद्र को दोषी करार देकर सजा सुनाई है।
इस मामले में कुल 15 आरोपी बनाए गए थे। इनमें तत्कालीन चौकी प्रभारी और तीन पुलिसकर्मी भी शामिल थे। हालांकि विवेचना के बाद पुलिस ने केवल कृष्णपाल उर्फ नेता, सुरेश और उसके साले राजेंद्र के खिलाफ ही आरोप पत्र दाखिल किया। शेष नाम हटा दिए गए। बाद में वादी पक्ष ने अन्य आरोपियों को भी तलब करने की मांग की जिसे अदालत ने खारिज कर दिया। वर्तमान में तीनों दोषी जमानत पर थे। मामले में कुल 13 गवाहों ने गवाही दी।
घटना के समय 2011 में मामला राजनीतिक रूप से भी गरमा गया था। तत्कालीन सपा जिलाध्यक्ष समरजीत सिंह समर्थकों के साथ मौके पर पहुंचे थे। इसके बाद चौकी पुलिस के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई और धरना-प्रदर्शन भी हुए। गांव में कई दिनों तक तनाव की स्थिति रही और पीएसी तैनात रही।
पति और बेटे को खोने के बाद सूर्यकली ने गांव छोड़ दिया और मायके तैफापुर में रहने लगीं। परिवार से भी गांव के लोगों की दूरी हो गई। इससे परिवार गांव आने के नाम से डरता है।