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Kaushambi News: संतोषी के धैर्य ने उन्हें बनाया कोटेदार, बनीं आत्मनिर्भर
संवाद न्यूज एजेंसी, कौशांबी
Updated Sun, 03 May 2026 01:34 AM IST
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संतोषी देवी
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सरसवां ब्लॉक के रक्सौली गांव की संतोषी देवी ने लोगों के तानों को सहा और हिम्मत नहीं हारी। उनके साहस और धैर्य ने उन्हें आज कोटेदार बना दिया। आज वह राशन की सरकारी दुकान चलाकर आत्मनिर्भर बन गई हैं। संतोषी बताती हैं कि शुरुआत में समूह से जुड़ने पर जिन महिलाओं ने उन्हें ताने मारे थे वही आज उनके साथ काम करने की इच्छा जाहिर कर रही हैं।
वर्ष 2021 में समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने अचार बनाने का छोटा व्यवसाय शुरू किया, लेकिन बाजार में मांग कम होने से वह ज्यादा दिन नहीं चल सका। इसके बाद मई 2025 में समूह के माध्यम से उन्हें राशन का कोटा मिला, जिससे आज वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के साथ समाज में सम्मान भी पा रही हैं।
संतोषी देवी ने बताया कि मई 2025 में समूह के माध्यम से उन्हें राशन की दुकान का कोटा मिल गया। इससे उनकी जिंदगी में बड़ा बदलाव आया। अब उनके पति ओमप्रकाश भी कोटे का काम देखते हैं और परिवार की आय पहले से बेहतर हो गई है।
जो पहले देती थीं ताना आज उनसे जुड़ने की जताती हैं इच्छा
संतोषी बताती हैं कि जब वह शुरुआत में समूह की बैठकों में जाने के लिए बैग लेकर निकलती थीं, तब आसपास की महिलाएं ताना मारती थीं। लोग कहते थे कि बैग टांगकर चल देती हैं, कहीं कुछ मिलने वाला नहीं है। उस समय यह बातें उन्हें चुभती थीं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
आज वही महिलाएं उनके पास आकर समूह से जुड़ने की इच्छा जताती हैं। संतोषी देवी कहती हैं कि अब हर व्यक्ति उन्हें सम्मान की नजर से देखता है। यह बदलाव उन्हें आत्मविश्वास और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
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वर्ष 2021 में समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने अचार बनाने का छोटा व्यवसाय शुरू किया, लेकिन बाजार में मांग कम होने से वह ज्यादा दिन नहीं चल सका। इसके बाद मई 2025 में समूह के माध्यम से उन्हें राशन का कोटा मिला, जिससे आज वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के साथ समाज में सम्मान भी पा रही हैं।
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संतोषी देवी ने बताया कि मई 2025 में समूह के माध्यम से उन्हें राशन की दुकान का कोटा मिल गया। इससे उनकी जिंदगी में बड़ा बदलाव आया। अब उनके पति ओमप्रकाश भी कोटे का काम देखते हैं और परिवार की आय पहले से बेहतर हो गई है।
जो पहले देती थीं ताना आज उनसे जुड़ने की जताती हैं इच्छा
संतोषी बताती हैं कि जब वह शुरुआत में समूह की बैठकों में जाने के लिए बैग लेकर निकलती थीं, तब आसपास की महिलाएं ताना मारती थीं। लोग कहते थे कि बैग टांगकर चल देती हैं, कहीं कुछ मिलने वाला नहीं है। उस समय यह बातें उन्हें चुभती थीं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
आज वही महिलाएं उनके पास आकर समूह से जुड़ने की इच्छा जताती हैं। संतोषी देवी कहती हैं कि अब हर व्यक्ति उन्हें सम्मान की नजर से देखता है। यह बदलाव उन्हें आत्मविश्वास और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।