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Lakhimpur Kheri News: चिड़ियाघरों में कट रही दुधवा के 10 बाघों की जिंदगी

संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी Updated Sat, 24 Jan 2026 11:00 PM IST
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10 tigers from Dudhwa are living in zoos
गोरखपुर चिड़ियाघर में कैद दुधवा का बाघ। स्रोत : वन विभाग
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बांकेगंज। दुधवा टाइगर रिजर्व से सटे इलाके में मानव-वन्यजीव संघर्ष की बढ़ती घटनाओं से जंगल में स्वछंद विचरण करने वाले बाघों की आजादी छिन रही है। जंगल में पूरा जीवन बिताने की जगह अब कई बाघ अपने गुनाहों की सजा काट रहे हैं। राजा की तरह जंगल में घूमने वाले बाघ चिड़ियाघरों के सीमित दायरे में रहने को मजबूर हैं।
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दुधवा के जंगल में विचरण करने वाले बाघ अक्सर रास्ता भटककर आबादी से सटे खेतों में गन्ने की फसल में पहुंच जाते हैं। जहां गन्ना कटाई के दौरान खेतों में छिपे बाघ इंसानों पर हमला कर उनकी जान ले रहे हैं। ऐसे में गन्ने के खेतों में रहने वाले बाघों का भविष्य अब जंगल नहीं, बल्कि चिड़ियाघर बन रहा है। लखनऊ, कानपुर और गोरखपुर चिड़ियाघर में वे बाघ हैं, जो मानव-वन्यजीव संघर्ष के बाद कैद किए गए हैं। हमलों के बाद इनको सलाखों के पीछे रहना पड़ रहा है। संवाद
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इंसेट
चिड़ियाघरों में 20 बाघ-बाघिन
डीटीआर में पिछले पांच सालों में 10 बाघ-बाघिनों को पकड़कर चिड़ियाघरों में रखा गया है। अगर पीलीभीत टाइगर रिजर्व (पीटीआर ) की बात करें तो यहां भी पिछले 11 सालों में 10 बाघों को पकड़ा गया है। वहीं चिड़ियाघरों में इन बाघों के रख-रखाव पर सरकारी पैसा भी काफी खर्च हो रहा है। ऐसे में जो वन्यजीव स्वयं का पेट भरने में सक्षम हैं, उनके लिए करोड़ों रुपया खर्च कर भोजन की व्यवस्था करनी पड़ रही है।
वर्जन
मानव-वन्यजीव संघर्ष घटनाओं की रोकथाम के लिए वन विभाग हर संभव प्रयास कर रहा है। इसके लिए जंगल से सटे गांवों में अभियान चलाकर ग्रामीणों को जागरूक भी किया जा रहा है।
- डॉ. एच राजामोहन, एफडी, दुधवा टाइगर रिजर्व।
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