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Lalitpur News: 1942 में ललितपुर से बानपुर तक निकली थी तिरंगा यात्रा, अंग्रेजों ने स्वतंत्रता सेनानियों को किया था गिरफ्तार
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संवाद न्यूज एजेंसी
बानपुर। देश की आजादी के लिए बानपुर के स्वतंत्रता सेनानियों ने भी संघर्ष में बढ़-चढ़कर भाग लिया। वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों ने ललितपुर से बानपुर तक तिरंगा यात्रा निकाली थी। हाथों में तिरंगा थामे सेनानी ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाते हुए आगे बढ़ रहे थे। अंग्रेजी सैनिकों ने गाइया नदी के पास यात्रा को रोककर सभी आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था।
राजा मोद प्रहलाद की वर्ष 1842 में बानपुर में मृत्यु के बाद तालबेहट-बानपुर राज्य की जिम्मेदारी उनके पुत्र महाराजा मर्दन सिंह ने संभाली। उन्होंने महारानी लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा लिया। अंग्रेजों ने बाद में महाराजा मर्दन सिंह को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। इसके बाद भी बानपुर के लोगों का स्वतंत्रता संग्राम जारी रहा।
बानपुर के सरदार सिंह परमार, उनके पुत्र देवी सिंह जू परमार, गजराज सिंह गहरवार, रघुवीर सिंह, मंगल सिंह कटारिया, गया प्रसाद दीक्षित, भूपत लोहार, गोरेलाल वर्मा, रामलाल यादव, अयोध्या प्रसाद सेहोरे, जयराम, अनंदीलाल और केलगवां के भगवान दास जोशी समेत कई सेनानियों ने राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।
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महात्मा गांधी के नमक कर विरोध, सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन की लहर जब जिले में पहुंची तो बानपुर भी इससे अछूता नहीं रहा। ललितपुर के नंदकिशोर किलेदार, बृजनंदन किलेदार और रामेश्वर प्रसाद शर्मा के नेतृत्व में सेनानियों ने राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लिया। रामेश्वर प्रसाद शर्मा के नेतृत्व में मंगल सिंह कटारिया संगठन का काम संभालते थे और बानपुर-महरौनी क्षेत्र के लोगों को आंदोलन के लिए संगठित करते थे।
गोरेलाल वर्मा बहरूपिया बनकर आंदोलनकारियों तक संदेश और डाक पहुंचाते थे। वर्ष 1942 के आंदोलन में उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा गया और यातनाएं दी गईं। वहीं भूपत राम गांधीवादी विचारों से प्रभावित थे। उनका काम रियासतों में जनजागरण करना था। वर्ष 1935 में उन्होंने आंदोलन से जुड़े साथियों के साथ उदयपुरा डाक बंगले पर तिरंगा फहराया और जॉर्ज पंचम का चित्र जला दिया था।
वर्ष 1942 में भूपत राम ने साथियों के साथ ललितपुर से बानपुर तक तिरंगा यात्रा निकाली। अंग्रेजी सैनिकों ने गाइया नदी के पास यात्रा रोककर सभी सेनानियों को गिरफ्तार कर लिया। सेनानी ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाते हुए जेल गए। उन पर 100 से 200 रुपये तक का अर्थदंड लगाया गया। जुर्माना न भरने वालों के घरों की संपत्ति कुर्क कर ली गई।
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मेरे पिता गया प्रसाद दीक्षित भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रहे। उन्होंने विभिन्न आंदोलनों में हिस्सा लिया और अंग्रेजों को देश से बाहर खदेड़ने के लिए लगातार संघर्ष किया। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के कारण उन्हें एक वर्ष की कैद और 100 रुपये का अर्थदंड मिला।
जमुना प्रसाद दीक्षित
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मेरे पिता गोरेलाल वर्मा पंडित जवाहरलाल नेहरू के भाषणों से प्रेरित हुए थे। पंडित रामेश्वर प्रसाद शर्मा के नेतृत्व में वे क्रांतिकारियों तक खाद्य सामग्री और संदेश पहुंचाने के लिए बहरूपिया बनकर काम करते थे। वर्ष 1942 के आंदोलन में उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। अर्थदंड न चुका पाने के कारण उनका मकान कुर्क कर लिया गया। वर्ष 1943 में अंग्रेजों ने उन्हें दोबारा गिरफ्तार किया था।
— मुन्नालाल वर्मा
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मेरे पिता का जन्म वर्ष 1912 में बानपुर कस्बे में हुआ था। वह सच्चे गांधीवादी बन गए थे। हाथ में तिरंगा थामकर उन्होंने देशभक्ति का फर्ज निभाया। 30 अगस्त 1942 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें एक वर्ष की कैद और 100 रुपये का अर्थदंड मिला, जिसे उन्होंने हंसते-हंसते स्वीकार किया।
— सुरेंद्र सिंह गहरवार
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मेरे पिता भूपत राम 1935 में 25 वर्ष की उम्र में राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल हो गए थे। वह उदयपुरा के डाक बंगले में लगे जॉर्ज पंचम के चित्र को जलाकर तिरंगा फहराने वाले आंदोलनकारियों में शामिल थे।
— मनोहरलाल झा
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बानपुर। देश की आजादी के लिए बानपुर के स्वतंत्रता सेनानियों ने भी संघर्ष में बढ़-चढ़कर भाग लिया। वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों ने ललितपुर से बानपुर तक तिरंगा यात्रा निकाली थी। हाथों में तिरंगा थामे सेनानी ‘इंकलाब जिंदाबाद’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाते हुए आगे बढ़ रहे थे। अंग्रेजी सैनिकों ने गाइया नदी के पास यात्रा को रोककर सभी आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था।
राजा मोद प्रहलाद की वर्ष 1842 में बानपुर में मृत्यु के बाद तालबेहट-बानपुर राज्य की जिम्मेदारी उनके पुत्र महाराजा मर्दन सिंह ने संभाली। उन्होंने महारानी लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा लिया। अंग्रेजों ने बाद में महाराजा मर्दन सिंह को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। इसके बाद भी बानपुर के लोगों का स्वतंत्रता संग्राम जारी रहा।
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बानपुर के सरदार सिंह परमार, उनके पुत्र देवी सिंह जू परमार, गजराज सिंह गहरवार, रघुवीर सिंह, मंगल सिंह कटारिया, गया प्रसाद दीक्षित, भूपत लोहार, गोरेलाल वर्मा, रामलाल यादव, अयोध्या प्रसाद सेहोरे, जयराम, अनंदीलाल और केलगवां के भगवान दास जोशी समेत कई सेनानियों ने राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।
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महात्मा गांधी के नमक कर विरोध, सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन की लहर जब जिले में पहुंची तो बानपुर भी इससे अछूता नहीं रहा। ललितपुर के नंदकिशोर किलेदार, बृजनंदन किलेदार और रामेश्वर प्रसाद शर्मा के नेतृत्व में सेनानियों ने राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लिया। रामेश्वर प्रसाद शर्मा के नेतृत्व में मंगल सिंह कटारिया संगठन का काम संभालते थे और बानपुर-महरौनी क्षेत्र के लोगों को आंदोलन के लिए संगठित करते थे।
गोरेलाल वर्मा बहरूपिया बनकर आंदोलनकारियों तक संदेश और डाक पहुंचाते थे। वर्ष 1942 के आंदोलन में उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा गया और यातनाएं दी गईं। वहीं भूपत राम गांधीवादी विचारों से प्रभावित थे। उनका काम रियासतों में जनजागरण करना था। वर्ष 1935 में उन्होंने आंदोलन से जुड़े साथियों के साथ उदयपुरा डाक बंगले पर तिरंगा फहराया और जॉर्ज पंचम का चित्र जला दिया था।
वर्ष 1942 में भूपत राम ने साथियों के साथ ललितपुर से बानपुर तक तिरंगा यात्रा निकाली। अंग्रेजी सैनिकों ने गाइया नदी के पास यात्रा रोककर सभी सेनानियों को गिरफ्तार कर लिया। सेनानी ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाते हुए जेल गए। उन पर 100 से 200 रुपये तक का अर्थदंड लगाया गया। जुर्माना न भरने वालों के घरों की संपत्ति कुर्क कर ली गई।
मेरे पिता गया प्रसाद दीक्षित भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रहे। उन्होंने विभिन्न आंदोलनों में हिस्सा लिया और अंग्रेजों को देश से बाहर खदेड़ने के लिए लगातार संघर्ष किया। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के कारण उन्हें एक वर्ष की कैद और 100 रुपये का अर्थदंड मिला।
जमुना प्रसाद दीक्षित
मेरे पिता गोरेलाल वर्मा पंडित जवाहरलाल नेहरू के भाषणों से प्रेरित हुए थे। पंडित रामेश्वर प्रसाद शर्मा के नेतृत्व में वे क्रांतिकारियों तक खाद्य सामग्री और संदेश पहुंचाने के लिए बहरूपिया बनकर काम करते थे। वर्ष 1942 के आंदोलन में उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। अर्थदंड न चुका पाने के कारण उनका मकान कुर्क कर लिया गया। वर्ष 1943 में अंग्रेजों ने उन्हें दोबारा गिरफ्तार किया था।
— मुन्नालाल वर्मा
मेरे पिता का जन्म वर्ष 1912 में बानपुर कस्बे में हुआ था। वह सच्चे गांधीवादी बन गए थे। हाथ में तिरंगा थामकर उन्होंने देशभक्ति का फर्ज निभाया। 30 अगस्त 1942 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें एक वर्ष की कैद और 100 रुपये का अर्थदंड मिला, जिसे उन्होंने हंसते-हंसते स्वीकार किया।
— सुरेंद्र सिंह गहरवार
मेरे पिता भूपत राम 1935 में 25 वर्ष की उम्र में राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल हो गए थे। वह उदयपुरा के डाक बंगले में लगे जॉर्ज पंचम के चित्र को जलाकर तिरंगा फहराने वाले आंदोलनकारियों में शामिल थे।
— मनोहरलाल झा