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Mainpuri News: किताबों में कमीशन का खेल, मजबूर अभिभावक रहे झेल
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मैनपुरी। सरकार तमाम प्रयास के बाद भी निजी स्कूलों की मनमानी पर रोक नहीं लग पा रही। निजी स्कूलों में नए सत्र में प्रवेश चल रहे हैं। प्रवेश के साथ ही तीन महीने की फीस जमा करने के अतिरिक्त अभिभावक किताब-काॅपी के लिए भी मोटी रकम खर्च कर रहे हैं। प्रत्येक स्कूल में अलग-अलग निजी पब्लिकेशन की किताबें तय हैं। कई स्कूल तो अब भी अपने परिसर में ही किताबें उपलब्ध कराकर मोटी रकम वसूल रहे हैं। स्कूल संचालकों के किताबों में कमीशन के खेल का बोझ मजबूरी में अभिभावकों को झेलना पड़ रहा। हर साल निजी स्कूल संचालक अभिभावकों की जेब ढीली करने के नए तरीके अपना रहे हैं। सुविधा के नाम पर रजिस्ट्रेशन व मासिक शुल्क में वृद्धि के साथ ही किताब-काॅपी के दाम बढ़ाकर अभिभावकों पर अतिरिक्त बोझ डाला जा रहा है। ज्यादातर मामलों में स्कूल की ओर से थमाई गईं किताबों की लिस्ट किसी खास पब्लिकेशन की होती है। यह किताबें शहर के चुनिंदा बुक स्टालों पर ही मिलती हैं। इस खेल में मोटी रकम के वारे-न्यारे हो रहे हैं। जानकार बताते हैं कि किसी खास प्राइवेट पब्लिकेशन की किताबें बेचने के लिए निजी स्कूल व किताब विक्रेता 50 से 60 प्रतिशत रकम कमीशन के रूप में ले रहे हैं। इसमें 10 से 20 प्रतिशत कमीशन पुस्तक विक्रेता के और बाकी का कमीशन स्कूल संचालक के पास पहुंचता है। जानकारों की मानें तो एनसीईआरटी की कक्षा एक की किताबों का सेट 350 रुपये का है। जबकि वही सेट निजी प्रकाशन का खरीदने पर 7 हजार रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं।
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प्रवेश के समय बताते कहां से खरीदें किताबें
शिक्षा विभाग के अधिकारियों की सख्ती के कारण बच्चों के प्रवेश के लिए विद्यालय पहुंचे अभिभावकों को दुकानों का हैंडबिल नहीं थमाया जा रहा। उन्हें मौखिक तौर पर दुकान का पता बता दिया जा रहा है। यह तय है कि संबंधित स्कूल की किताबें और ड्रेस चिह्नित दुकान के अलावा कहीं नहीं मिल रही है।
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मेरा बेटा शहर के एक निजी स्कूल में पढ़ता है। प्रवेश प्रक्रिया पूरी होने के बाद स्कूल की ओर से पुस्तकें मिलने के लिए शहर की एक दुकान का पता बताया गया। कहा गया कि उस दुकान के अतिरिक्त कहीं और पर किताबें नहीं मिलेंगी। - भावना जैन
मेरा बेटा शहर के एक निजी स्कूल में पढ़ता है। मासिक फीस से लेकर किताब-काॅपी व ड्रेस तक के दाम पिछली बार से अधिक चुकाने पड़ रहे हैं। किताब सहित कॉपियां भी एक निर्धारित दुकान से खरीदनी पड़ीं। कीमतें भी पिछली बार से ज्यादा हो गईं। अब बच्चे पढ़ाने हैं तो शिकायत भी नहीं कर सकते। - प्रतीक्षा दीक्षित
कोई अभिभावक अगर शिकायत करता है तो इसकी जांच कराई जाएगी। निजी स्कूलों को इसके लिए निर्देशित भी किया जाएगा। कोई स्कूल अपने यहां किताब या काॅपी नहीं बेच सकता। अगर वह ऐसा कर रहा है तो यह गलत है। उसपर कार्रवाई की जाएगी। - सतीश कुमार, जिला विद्यालय निरीक्षक
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मेरा बेटा शहर के एक निजी स्कूल में पढ़ता है। प्रवेश प्रक्रिया पूरी होने के बाद स्कूल की ओर से पुस्तकें मिलने के लिए शहर की एक दुकान का पता बताया गया। कहा गया कि उस दुकान के अतिरिक्त कहीं और पर किताबें नहीं मिलेंगी। - भावना जैन
मेरा बेटा शहर के एक निजी स्कूल में पढ़ता है। मासिक फीस से लेकर किताब-काॅपी व ड्रेस तक के दाम पिछली बार से अधिक चुकाने पड़ रहे हैं। किताब सहित कॉपियां भी एक निर्धारित दुकान से खरीदनी पड़ीं। कीमतें भी पिछली बार से ज्यादा हो गईं। अब बच्चे पढ़ाने हैं तो शिकायत भी नहीं कर सकते। - प्रतीक्षा दीक्षित
कोई अभिभावक अगर शिकायत करता है तो इसकी जांच कराई जाएगी। निजी स्कूलों को इसके लिए निर्देशित भी किया जाएगा। कोई स्कूल अपने यहां किताब या काॅपी नहीं बेच सकता। अगर वह ऐसा कर रहा है तो यह गलत है। उसपर कार्रवाई की जाएगी। - सतीश कुमार, जिला विद्यालय निरीक्षक