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Mau News: स्ट्रेचर पर मरीज, पानी में व्यवस्था...इलाज से पहले टूटी सड़क और जलभराव से जूझना पड़ रहा
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इमरजेंसी वार्ड से ट्रामा विंग को जाते पानी भरे गड्ढे के बीच घायल दयानंद को स्ट्रेचर से ले जाते
- फोटो : 1
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जिले के सबसे बड़े सरकारी जिला अस्पताल में सड़क हादसों में घायल या गंभीर मरीजों के लिए इन दिनों अस्पताल पहुंचना ही चुनौती बन चुका है। दरअसल, बारिश के समय में सड़क और सीवर का काम कराया जा रहा है।
वहीं, अस्पताल के मुख्य गेट से लेकर इमरजेंसी और ट्रामा विंग तक सड़कें टूटी हुई हैं, जो बारिश के बाद तालाब में तब्दील हो जाती हैं और मरीजों के लिए परेशानी का सबब बन रही हैं।
इस बीच जिम्मेदारों की मॉनिटरिंग न होने से निर्माण कार्यदायी संस्था ने बीच सड़क पर निर्माण सामग्री डंप कर इस समस्या को दोगुना कर दिया है। सोमवार को टीम ने खुद ग्राउंड पर पहुंचकर यहां दोपहर 12 बजे से 1 बजे तक रहकर मरीजों को हो रही समस्याओं को जानने की कोशिश की।
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इस दौरान टीम ने देखा कि एक बुजुर्ग मरीज को इमरजेंसी से दो सौ मीटर दूर ट्रामा विंग ले जाते समय गड्ढों से बचाते हुए संघर्ष करना पड़ा। यहां पूछताछ में टीम को परिजनों ने मरीज का नाम दयानंद निवासी ताजोपुर बताया।
उन्होंने बताया कि दयानंद घर में फिसलकर गिर गए, जिससे उनका पैर फ्रैक्चर हो गया। इसके बाद उन्हें जिला अस्पताल लेकर पहुंचे। यहां इमरजेंसी में भर्ती कराने के बाद प्लास्टर के लिए उन्हें ट्रामा सेंटर में जाने को कहा गया।
इसके बाद वह खुद स्ट्रेचर से मरीज को लेकर पहुंचे। इस दौरान सड़क पर बने गड्ढों से बचना और ट्रामा सेंटर के पास निर्माण सामग्री डंप होने से उनके लिए परेशानी का सबब बना रहा।
वहीं, एक मरीज रमेश के परिजन सोनू ने बताया कि निर्माण सामग्री बीच सड़क पर डंप होने से उन्हें खुद मरीज को ट्रामा सेंटर पहुंचाने में काफी दिक्कत हुई है।
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वर्जन-- -
जिला अस्पताल में उनके आवास से गेट तक सड़क के साथ सीवर की समस्या को लेकर ड्रेनेज सिस्टम के लिए निर्माण कार्य चल रहा है। यह कार्य उत्तर प्रदेश राज्य निर्माण निगम द्वारा एक करोड़ 40 लाख रुपये की लागत से किया जा रहा है। बारिश से पहले काम पूरा क्यों नहीं हुआ इसकी जानकारी कार्यदायी संस्था से ली जाएगी। - डॉ. धनंजय कुमार, सीएमएस
गड्ढे और अवैध अतिक्रमण के बाद डंप निर्माण सामग्री से परेशानी
मऊ। जिला अस्पताल का प्रवेश द्वार मरीजों और उनके तीमारदारों के लिए एक चुनौती साबित हो रहा है। टूटी हुई सड़कें और गड्ढों में जमा बारिश का पानी मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने में बाधा उत्पन्न कर रहा है। विशेष रूप से, जिन मरीजों को स्ट्रेचर पर लाया जाता है, उन्हें इन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। पानी भरे रास्तों से स्ट्रेचर गुजारना न केवल कर्मचारियों के लिए बल्कि मरीजों के लिए भी कष्टदायक है। इलाज कराने पहुंचे मोहन, राहुल, सतीश ने बताया कि जिला अस्पताल में इलाज कराने से पहले मुख्य मार्ग पर जाम से बचना, फिर अस्पताल पहुंचते ही टूटे गड्ढों के बीच ओपीडी से लेकर इमरजेंसी पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं है। संवाद
नाम के जनऔषधि केंद्र, बाहर से दवा लेने को कहते हैं दुकानदार
जिला अस्पताल और महिला जिला अस्पताल में मरीजों को बेहद कम दरों पर दवाइयां उपलब्ध कराने के लिए भले ही प्रधानमंत्री जनऔषधि केंद्र बनाया गया है, लेकिन यहां दवाइयों की कमी है या कुछ और। यहां पहुंचने वाले मरीजों को डॉक्टर द्वारा लिखी गई पूरी दवाइयां कभी नहीं मिलती हैं। टीम ने यहां देखा कि रैनी से आए टीबी के एक मरीज ने डॉक्टर की लिखी पांच दवाइयां लेकर पहुंचा लेकिन जनऔषधि केंद्र से केवल एक दवाई मिली। महिला जिला अस्पताल में पड़ताल में पाया गया कि यहां बने केंद्र से दवा लेने गई पहसा निवासी गीता को दवा न होने पर वापस लौटा दिया गया। इस दौरान पहसा की संगीता ने दवा न मिलने की शिकायत की।
जनऔषधि केंद्र पर ब्रांडेड दवाओं के मुकाबले 50 से 90% तक सस्ती मिलती हैं दवाइयां
केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही एक पहल है, जिसका उद्देश्य आम जनता, विशेषकर गरीबों को ब्रांडेड दवाओं के मुकाबले 50% से 90% तक सस्ती उच्च गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराना है। इन केंद्रों पर सभी प्रमुख बीमारियों से जुड़ी दवाइयां और सर्जिकल उत्पाद उपलब्ध होने का नियम है। यहां प्रमुख रूप से एंटीबायोटिक्स और एंटी-इन्फेक्टिव (जीवाणु संक्रमण और अन्य बीमारियों के इलाज के लिए), हृदय रोग (कार्डियोवैस्कुलर) की दवाइयां (ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियों के लिए), मधुमेह (डायबिटीज) की दवाइयां (शुगर कंट्रोल करने के लिए), दर्द निवारक (एनाल्जेसिक) और सूजनरोधी (एंटी-इंफ्लेमेटरी), गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल दवाइयां (पेट से जुड़ी समस्याओं के लिए), विटामिन, मिनरल और सप्लीमेंट्स, श्वसन प्रणाली (रेस्पिरेटरी) की दवाइयां (अस्थमा और खांसी के लिए), त्वचा संबंधी दवाइयां (क्रीम और लोशन), आयुष और सर्जिकल उत्पाद (जैसे सैनिटरी पैड, सिरिंज आदि) की उपलब्धता जरूरी होती है।
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वहीं, अस्पताल के मुख्य गेट से लेकर इमरजेंसी और ट्रामा विंग तक सड़कें टूटी हुई हैं, जो बारिश के बाद तालाब में तब्दील हो जाती हैं और मरीजों के लिए परेशानी का सबब बन रही हैं।
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इस बीच जिम्मेदारों की मॉनिटरिंग न होने से निर्माण कार्यदायी संस्था ने बीच सड़क पर निर्माण सामग्री डंप कर इस समस्या को दोगुना कर दिया है। सोमवार को टीम ने खुद ग्राउंड पर पहुंचकर यहां दोपहर 12 बजे से 1 बजे तक रहकर मरीजों को हो रही समस्याओं को जानने की कोशिश की।
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इस दौरान टीम ने देखा कि एक बुजुर्ग मरीज को इमरजेंसी से दो सौ मीटर दूर ट्रामा विंग ले जाते समय गड्ढों से बचाते हुए संघर्ष करना पड़ा। यहां पूछताछ में टीम को परिजनों ने मरीज का नाम दयानंद निवासी ताजोपुर बताया।
उन्होंने बताया कि दयानंद घर में फिसलकर गिर गए, जिससे उनका पैर फ्रैक्चर हो गया। इसके बाद उन्हें जिला अस्पताल लेकर पहुंचे। यहां इमरजेंसी में भर्ती कराने के बाद प्लास्टर के लिए उन्हें ट्रामा सेंटर में जाने को कहा गया।
इसके बाद वह खुद स्ट्रेचर से मरीज को लेकर पहुंचे। इस दौरान सड़क पर बने गड्ढों से बचना और ट्रामा सेंटर के पास निर्माण सामग्री डंप होने से उनके लिए परेशानी का सबब बना रहा।
वहीं, एक मरीज रमेश के परिजन सोनू ने बताया कि निर्माण सामग्री बीच सड़क पर डंप होने से उन्हें खुद मरीज को ट्रामा सेंटर पहुंचाने में काफी दिक्कत हुई है।
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जिला अस्पताल में उनके आवास से गेट तक सड़क के साथ सीवर की समस्या को लेकर ड्रेनेज सिस्टम के लिए निर्माण कार्य चल रहा है। यह कार्य उत्तर प्रदेश राज्य निर्माण निगम द्वारा एक करोड़ 40 लाख रुपये की लागत से किया जा रहा है। बारिश से पहले काम पूरा क्यों नहीं हुआ इसकी जानकारी कार्यदायी संस्था से ली जाएगी। - डॉ. धनंजय कुमार, सीएमएस
गड्ढे और अवैध अतिक्रमण के बाद डंप निर्माण सामग्री से परेशानी
मऊ। जिला अस्पताल का प्रवेश द्वार मरीजों और उनके तीमारदारों के लिए एक चुनौती साबित हो रहा है। टूटी हुई सड़कें और गड्ढों में जमा बारिश का पानी मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने में बाधा उत्पन्न कर रहा है। विशेष रूप से, जिन मरीजों को स्ट्रेचर पर लाया जाता है, उन्हें इन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। पानी भरे रास्तों से स्ट्रेचर गुजारना न केवल कर्मचारियों के लिए बल्कि मरीजों के लिए भी कष्टदायक है। इलाज कराने पहुंचे मोहन, राहुल, सतीश ने बताया कि जिला अस्पताल में इलाज कराने से पहले मुख्य मार्ग पर जाम से बचना, फिर अस्पताल पहुंचते ही टूटे गड्ढों के बीच ओपीडी से लेकर इमरजेंसी पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं है। संवाद
नाम के जनऔषधि केंद्र, बाहर से दवा लेने को कहते हैं दुकानदार
जिला अस्पताल और महिला जिला अस्पताल में मरीजों को बेहद कम दरों पर दवाइयां उपलब्ध कराने के लिए भले ही प्रधानमंत्री जनऔषधि केंद्र बनाया गया है, लेकिन यहां दवाइयों की कमी है या कुछ और। यहां पहुंचने वाले मरीजों को डॉक्टर द्वारा लिखी गई पूरी दवाइयां कभी नहीं मिलती हैं। टीम ने यहां देखा कि रैनी से आए टीबी के एक मरीज ने डॉक्टर की लिखी पांच दवाइयां लेकर पहुंचा लेकिन जनऔषधि केंद्र से केवल एक दवाई मिली। महिला जिला अस्पताल में पड़ताल में पाया गया कि यहां बने केंद्र से दवा लेने गई पहसा निवासी गीता को दवा न होने पर वापस लौटा दिया गया। इस दौरान पहसा की संगीता ने दवा न मिलने की शिकायत की।
जनऔषधि केंद्र पर ब्रांडेड दवाओं के मुकाबले 50 से 90% तक सस्ती मिलती हैं दवाइयां
केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही एक पहल है, जिसका उद्देश्य आम जनता, विशेषकर गरीबों को ब्रांडेड दवाओं के मुकाबले 50% से 90% तक सस्ती उच्च गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराना है। इन केंद्रों पर सभी प्रमुख बीमारियों से जुड़ी दवाइयां और सर्जिकल उत्पाद उपलब्ध होने का नियम है। यहां प्रमुख रूप से एंटीबायोटिक्स और एंटी-इन्फेक्टिव (जीवाणु संक्रमण और अन्य बीमारियों के इलाज के लिए), हृदय रोग (कार्डियोवैस्कुलर) की दवाइयां (ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियों के लिए), मधुमेह (डायबिटीज) की दवाइयां (शुगर कंट्रोल करने के लिए), दर्द निवारक (एनाल्जेसिक) और सूजनरोधी (एंटी-इंफ्लेमेटरी), गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल दवाइयां (पेट से जुड़ी समस्याओं के लिए), विटामिन, मिनरल और सप्लीमेंट्स, श्वसन प्रणाली (रेस्पिरेटरी) की दवाइयां (अस्थमा और खांसी के लिए), त्वचा संबंधी दवाइयां (क्रीम और लोशन), आयुष और सर्जिकल उत्पाद (जैसे सैनिटरी पैड, सिरिंज आदि) की उपलब्धता जरूरी होती है।