स्मृति: घर जला पर राख में भी जिंदा रही मोहब्बत, दंगों ने बदली बशीर बद्र की शायरी, इंसानियत पर कभी न टूटा यकीन
1987 के मेरठ दंगों में घर और पांडुलिपियां खोने के बाद भी उर्दू शायर बशीर बद्र का इंसानियत और भाईचारे पर भरोसा नहीं टूटा। पढ़िए कैसे दंगों की राख से उनकी शायरी को मिला नया अहसास।
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उर्दू अदब की दुनिया में अपनी नर्म लहजे वाली गजलों से पहचान बनाने वाले डॉ. बशीर बद्र ने जिंदगी में ऐसा दर्द देखा, जिसने उनकी पूरी दुनिया बदल दी। मेरठ में वर्ष 1987 के सांप्रदायिक दंगों में उन्होंने अपना घर, किताबें, पांडुलिपियां और वर्षों की जमा पूंजी खो दी, लेकिन इंसानियत और भाईचारे पर उनका भरोसा कभी नहीं टूटा। यही दर्द आगे चलकर उनकी शायरी की सबसे बड़ी ताकत बन गया।
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दंगों की आग में जला घर, लेकिन नहीं बुझी इंसानियत
बशीर बद्र कहा करते थे कि दंगों ने उन्हें केवल आर्थिक नुकसान नहीं पहुंचाया, बल्कि उनकी सोच और शायरी को भी नया मोड़ दिया। उनका मानना था कि नफरत के माहौल में भी जो लोग इंसानियत का साथ निभाते हैं, वही समाज की असली पहचान होते हैं।
मुजफ्फरनगर में अमर उजाला संवाददाता से हुई एक मुलाकात के दौरान उन्होंने बताया था कि दहशत और आगजनी के बीच भी कई लोग अपने पड़ोसियों की रक्षा के लिए खड़े रहे। उनके अनुसार दंगे कुछ समय के लिए होते हैं, लेकिन समाज को हमेशा साथ मिलकर ही जीना पड़ता है।
हिंदू पड़ोसियों ने बचाई थी बहू-बेटियों की जान
बद्र साहब अक्सर अपने हिंदू पड़ोसियों का जिक्र भावुक होकर किया करते थे। उन्होंने बताया था कि जब उनका घर आग की लपटों में घिरा हुआ था, तब आसपास रहने वाले लोग अपने घरों से पानी भर-भरकर ला रहे थे। किसी ने सवाल किया कि इतने बड़े शोले एक कलसे पानी से कैसे बुझेंगे, तो जवाब मिला था-'आग भले न बुझे, लेकिन उसे और फैलने से जरूर रोका जा सकता है।'
उन्होंने बताया था कि हरगोपाल सिंह और धर्मपाल सिंह ने दंगों के दौरान उनकी बहू-बेटियों को अपने घर में छिपाकर सुरक्षित रखा। वहीं उनकी तकलीफ की खबर सुनते ही सबसे पहले शायर पंडित वेद दीवाना उनसे मिलने पहुंचे थे।
शायरी को बनाया इंसानियत की आवाज
बशीर बद्र का कहना था कि मेरठ में ऐसे अनगिनत हिंदू और मुसलमान थे, जिन्होंने दंगों के दौरान अपने दोस्तों और पड़ोसियों की जान बचाने के लिए खतरे उठाए। उनका मानना था कि आने वाले समय में उनकी शायरी इन्हीं जज्बातों की आवाज बनेगी और वह फिरकापरस्ती के खिलाफ अपनी कलम चलाते रहेंगे।
सांप्रदायिक दंगों पर काबू पाने के सवाल पर उनका जवाब बेहद साफ था। उनका कहना था कि दंगा छोटा हो या बड़ा, उसे रोकने के लिए प्रशासन को पूरी सख्ती दिखानी चाहिए और समाज में नफरत फैलाने वालों से बिना किसी भेदभाव के निपटना जरूरी है।
उन्होंने बुद्धिजीवियों से भी अपील की थी कि इंसानियत और भाईचारे को बचाने के लिए जोखिम उठाने से पीछे नहीं हटना चाहिए। उनका विश्वास था कि सच एक दिन जरूर सामने आता है और इंसानियत की आवाज कभी दब नहीं सकती।