सेंट्रल मार्केट: संकट बरकरार, तलाशे जा रहे राहत के विकल्प, पूर्व सरकारों पर अवैध निर्माण बढ़ाने के आरोप
Meerut Central Market Demolition Row: मेरठ के सेंट्रल मार्केट ध्वस्तीकरण विवाद में राज्य सरकार व्यापारियों को राहत देने के विकल्प तलाश रही है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मामला और गंभीर हो गया है, जबकि विपक्ष पूर्व सरकारों पर अवैध निर्माण को बढ़ावा देने के आरोप लगा रहा है।
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मेरठ के सेंट्रल मार्केट ध्वस्तीकरण विवाद में भले ही कार्रवाई टलती हुई नजर नहीं आ रही हो, लेकिन राज्य सरकार अब भी व्यापारियों को राहत देने के रास्ते तलाशने में जुटी है। सरकार का कहना है कि पूरे मामले का समाधान कानून के दायरे में ही होगा, लेकिन कोशिश यही है कि वर्षों से व्यापार कर रहे दुकानदारों का नुकसान कम से कम हो सके।
1989 से चल रहा है विवाद
सेंट्रल मार्केट का विवाद कोई नया नहीं है। यह मामला वर्ष 1989 से चला आ रहा है और इस दौरान कई स्तरों पर भ्रष्टाचार, अनियमितताओं और राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप भी लगते रहे।
मामला आखिरकार सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया, जहां से आए आदेश के बाद ध्वस्तीकरण की कार्रवाई लगभग तय मानी जा रही है। इस बीच विपक्षी दलों ने भी प्रदेश सरकार की भूमिका को लेकर सवाल उठाए हैं। हालांकि राज्य सरकार का दावा है कि उसने शुरुआत से ही प्रभावित व्यापारियों के हित में समाधान निकालने का प्रयास किया है।
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व्यापारियों को दिए गए थे तीन विकल्प
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सेंट्रल मार्केट के व्यापारियों से मुलाकात कर उन्हें नुकसान से बचाने के लिए तीन विकल्प भी सुझाए थे। पहला विकल्प यह था कि प्रभावित व्यापारी खुद सरकार के साथ मिलकर इस मामले में पक्षकार बनें, ताकि न्यायालय में उनका पक्ष अधिक मजबूती से रखा जा सके।
दूसरे विकल्प में आवास विकास विभाग द्वारा निर्धारित कंपाउंडिंग शुल्क जमा कर नियमों के अनुरूप समाधान खोजने की सलाह दी गई थी, जिससे ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को रोका जा सके।
तीसरे विकल्प के तहत यह प्रस्ताव रखा गया था कि सुप्रीम कोर्ट के संभावित फैसले को ध्यान में रखते हुए व्यापारी सेंट्रल मार्केट छोड़ने का निर्णय लें और राज्य सरकार की पुनर्वास योजना स्वीकार कर लें। इस योजना के तहत सरकार सभी प्रभावितों के पुनर्वास की जिम्मेदारी लेने को तैयार थी। हालांकि इन तीनों विकल्पों पर व्यापारियों और सरकार के बीच सहमति नहीं बन सकी और इसी बीच सुप्रीम कोर्ट का आदेश आ गया।
पूर्व सरकारों पर अवैध निर्माण को बढ़ावा देने के आरोप
सेंट्रल मार्केट का यह मामला अब राजनीतिक रंग भी ले चुका है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि पिछली जनता दल, सपा और बसपा सरकारों के कार्यकाल में अवैध निर्माणों को नजरअंदाज किया गया और कई मामलों में उन्हें बढ़ावा भी मिला।
खासकर वर्ष 2013 से 2017 के बीच नियमों को ताक पर रखकर बड़े पैमाने पर निर्माण होने की बात कही जा रही है। वर्तमान सरकार का कहना है कि अवैध निर्माणों को संरक्षण देने वालों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई की जाएगी।

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