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Meerut News: लकवे को हराकर 72 वर्ष की उम्र में साइकिल से कांवड़ ला रहे फिरोजपुर के धर्मपाल
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संवाद न्यूज एजेंसी
मवाना (मेरठ)। बुलंदशहर के गांव बेरा फिरोजपुर निवासी 72 वर्षीय धर्मपाल की शिव भक्ति की अद्भुत कहानी हर किसी में अटूट श्रद्धा जगाती है। पिछले 40 वर्षों से कांवड़ ला रहे धर्मपाल नौ वर्ष पहले पक्षाघात (लकवे) की चपेट में आकर छह साल तक बिस्तर पर रहे। भोलेनाथ की कृपा से ठीक होने के बाद अब वह साइकिल से हरिद्वार से जल ला रहे हैं।
धर्मपाल की शिव भक्ति की यह अद्भुत और प्रेरणादायक कहानी हर किसी के दिल में श्रद्धा जगा देती है। उम्र के इस पड़ाव में जहां आमतौर पर लोग आराम की राह चुनते हैं, वहीं धर्मपाल का जज्बा और अटूट विश्वास आज भी उन्हें हरिद्वार की पवित्र यात्रा पर खींचे ले जाता है। 40 वर्षों से वह लगातार भोलेनाथ की कांवड़ ला रहे हैं। उनकी इस अविराम भक्ति यात्रा में एक समय ऐसा भी आया जब नियति ने उनकी कड़ी परीक्षा ली। लगभग नौ साल पहले वह अचानक पक्षाघात यानी फालिज (लकवे) की चपेट में आ गए थे। बीमारी का असर इतना गंभीर था कि वह अगले छह वर्षों तक बिस्तर पर ही रहे और अपने दैनिक कार्यों के लिए भी दूसरों पर निर्भर हो गए थे लेकिन शिव भक्ति की जो लौ उनके भीतर जल रही थी, वह कभी मंद नहीं पड़ी।
धर्मपाल का दृढ़ विश्वास है कि भोलेनाथ की असीम अनुकंपा और दिव्य कृपा से ही वह इस असाध्य बीमारी से पूरी तरह ठीक हो सके। बीमारी को मात देने के बाद उनके कदमों की रफ्तार तो थोड़ी धीमी हुई, लेकिन भक्ति का संकल्प और मजबूत हो गया। पैरों से पैदल चलने में कठिनाई होने के बावजूद उन्होंने कांवड़ लाने का अपना सिलसिला रुकने नहीं दिया और अब वह साइकिल से हरिद्वार जाकर जल लाते हैं। इस बार वह 4 अगस्त को हरिद्वार के पवित्र गंगा तट से जल उठाकर अपने गांव के 16 अन्य शिवभक्तों के साथ निरंतर आगे बढ़ रहे हैं।
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मवाना (मेरठ)। बुलंदशहर के गांव बेरा फिरोजपुर निवासी 72 वर्षीय धर्मपाल की शिव भक्ति की अद्भुत कहानी हर किसी में अटूट श्रद्धा जगाती है। पिछले 40 वर्षों से कांवड़ ला रहे धर्मपाल नौ वर्ष पहले पक्षाघात (लकवे) की चपेट में आकर छह साल तक बिस्तर पर रहे। भोलेनाथ की कृपा से ठीक होने के बाद अब वह साइकिल से हरिद्वार से जल ला रहे हैं।
धर्मपाल की शिव भक्ति की यह अद्भुत और प्रेरणादायक कहानी हर किसी के दिल में श्रद्धा जगा देती है। उम्र के इस पड़ाव में जहां आमतौर पर लोग आराम की राह चुनते हैं, वहीं धर्मपाल का जज्बा और अटूट विश्वास आज भी उन्हें हरिद्वार की पवित्र यात्रा पर खींचे ले जाता है। 40 वर्षों से वह लगातार भोलेनाथ की कांवड़ ला रहे हैं। उनकी इस अविराम भक्ति यात्रा में एक समय ऐसा भी आया जब नियति ने उनकी कड़ी परीक्षा ली। लगभग नौ साल पहले वह अचानक पक्षाघात यानी फालिज (लकवे) की चपेट में आ गए थे। बीमारी का असर इतना गंभीर था कि वह अगले छह वर्षों तक बिस्तर पर ही रहे और अपने दैनिक कार्यों के लिए भी दूसरों पर निर्भर हो गए थे लेकिन शिव भक्ति की जो लौ उनके भीतर जल रही थी, वह कभी मंद नहीं पड़ी।
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धर्मपाल का दृढ़ विश्वास है कि भोलेनाथ की असीम अनुकंपा और दिव्य कृपा से ही वह इस असाध्य बीमारी से पूरी तरह ठीक हो सके। बीमारी को मात देने के बाद उनके कदमों की रफ्तार तो थोड़ी धीमी हुई, लेकिन भक्ति का संकल्प और मजबूत हो गया। पैरों से पैदल चलने में कठिनाई होने के बावजूद उन्होंने कांवड़ लाने का अपना सिलसिला रुकने नहीं दिया और अब वह साइकिल से हरिद्वार जाकर जल लाते हैं। इस बार वह 4 अगस्त को हरिद्वार के पवित्र गंगा तट से जल उठाकर अपने गांव के 16 अन्य शिवभक्तों के साथ निरंतर आगे बढ़ रहे हैं।
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