मेरठ छावनी में सबसे पहले स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल बजा था। भारत की यह छावनी अंग्रेजों के समय की है। प्रथम विश्व युद्ध के सैनिकों की वर्दियों को यहां आज भी संजोकर रखी गई हैं। 'पंजाब रेजिमेंट' से भी इस छावनी का बहुत पुराना और खास नाता है। आज हम आपको बता रहे हैं प्रसिद्ध मेरठ छावनी से जुड़े कुछ रोचक तथय जिनके बारे में आप शायद ही जानते हों :-
यहां रखी हैं 'प्रथम विश्व युद्ध' के सैनिकों की वर्दियां, मेरठ छावनी से जुड़ी 7 खास बातें
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अंग्रेजों ने की थी स्थापना
मेरठ छावनी की स्थापना 1803 में अंग्रेजों के द्वारा की गई थी। यह भारत की दूसरी सबसे पुरानी और बड़ी छावनी है। हाल ही में यहां एक सेना के जवान को पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया जिसके बाद छावनी काफी सुर्खियों में रही।
यहां से धधकी थी स्वतंत्रता संग्राम की ज्वाला
जी हां, यह वही जगह है। जहां से स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल बजा। 9 मई साल 1857 की रात को मेरठ छावनी के 85 सैनिकों, ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर दिया। दरअसल, मेरठ छावनी में चर्बी वाले कारतूस और हड्डियों के चूर्ण वाले आटे की बात गोपनीय तरीके से सैनिकों में पहुंच गई, जिसके बाद सभी सैनिकों ने अंग्रेजों को सबक सिखाने की ठान ली। धनसिंह के नेतृत्व में क्रांतिकारी भीड़ ने रात दो बजे मेरठ जेल पर हमला कर दिया और जेल तोड़कर 836 कैदियों को छुड़ा लिया। जेल से छूटे सभी कैदी क्रांति में शामिल हो गए। यह ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक सशस्त्र विद्रोह था। यह विद्रोह दो वर्षों तक भारत के विभिन्न क्षेत्रों में चला।
ब्रिटिश काल के हैं कैंट स्टेशन और माल रोड
मेरठ का छावनी स्थित रेलवे स्टेशन भी ब्रिटिश काल का ही बना हुआ है। इसके अलावा मेरठ का माल रोड, मूलतः ब्रिटिश छावनी का ही हिस्सा थी, यहां की एक घटना प्रसिद्ध है कि इस रोड़ पर एक भारतीय जो घोड़ा बग्घी चलाता था उसने एक अंग्रेज अफसर को रेस में हरा दिया था। इस हार को अंग्रेज बर्दाश्त नहीं कर पाए और रघुवीर सारंग को झूठे आरोपों में गिरफ्तार कराकर कोड़े लगवाए गए थे। ब्रिटिश काल में 1940 के दशक में मेरठ के सिनेमाघरों में ब्रिटिश राष्ट्रगान बजने के समय हिलना तक निषेध था।
पाक यु़द्ध के बाद बनाया गया गुरुद्वारा
मेरठ छावनी में स्थित शीशे वाला गुरुद्वारा काफी प्रसिद्ध है। दरअसल, इस गुरुद्वारे का संबंध पंजाब रेजिमेंट से है। पंजाब रेजीमेंट 1929 से 1976 तक मेरठ में रही। सन् 1971 में भारत पाक युद्ध में मिली जीत के बाद 1972 में गुरुद्वारे की स्थापना की गई और लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ने इसकी आधारशिला रखी।