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Mirzapur News: 300 की क्षमता वाले केंद्र में ए, बी और ओ पॉजिटिव का एक भी यूनिट ब्लड नहीं
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सिर्फ दो ग्रुप के 12 यूनिट रक्त उपलब्ध, थैलेसीमिया और अप्लास्टिक एनीमिया के मरीजों को परेशानी
मिर्जापुर। मंडलीय अस्पताल के ब्लड बैंक में पिछले तीन दिनों से रक्त की कमी बनी हुई है। मरीजों को सबसे अधिक ए, बी और ओ पॉजिटिव ग्रुप की एक भी यूनिट ब्लड नहीं है। इन्हीं ग्रुप की रक्त की सबसे अधिक जरूरत पड़ती है। अस्पताल में भर्ती सामान्य मरीजों के साथ कैंसर, अप्लास्टिक एनीमिया और थैलेसीमिया से पीड़ित मरीजों को भी खून की जरूरत होती है। इन मरीजों को उपलब्धता के आधार पर रक्तदान कराए बिना रक्त उपलब्ध कराया जाता है, लेकिन जरूरी रक्त समूहों का रक्त नहीं होने से मरीजों और उनके परिजनों को भटकना पड़ रहा है। उन्हें निजी ब्लड बैंकों या दूसरे जिलों के रक्त केंद्रों का रुख करना पड़ रहा है।
मंडलीय अस्पताल के ब्लड बैंक की क्षमता 300 यूनिट है, लेकिन यहां कभी 100 यूनिट से अधिक रक्त उपलब्ध नहीं रहता। बड़े रक्तदान शिविरों के बाद ही रक्त की उपलब्धता 100 यूनिट तक पहुंच पाती है। यहां महीने में 300 और साल में लगभग तीन हजार यूनिट रक्त की खपत होती है। इसमें 30 प्रतिशत रक्त बिना रक्तदान कराए दिया जाता है।
वर्तमान में ब्लड बैंक में सिर्फ दो रक्त समूहों का कुल 12 यूनिट रक्त उपलब्ध है। आठ रक्त समूहों में से ए पॉजिटिव, ए निगेटिव, बी पॉजिटिव, एबी निगेटिव, ओ पॉजिटिव और ओ निगेटिव का एक भी यूनिट रक्त उपलब्ध नहीं है। बी निगेटिव के दो और एबी पॉजिटिव के 10 यूनिट रक्त उपलब्ध हैं। कुल खपत में 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा ए, बी और ओ पॉजिटिव रक्त समूहों का है। इन तीनों समूहों का रक्त उपलब्ध नहीं होने से मरीजों को परेशानी हो रही है।
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मेडिकल कॉलेज के बाद भी रक्तदान के प्रति जागरूकता की कमी
चिकित्सक और स्वास्थ्यकर्मी लोगों को रक्तदान के प्रति जागरूक रहने के लिए प्रेरित करते हैं, लेकिन स्वास्थ्यकर्मियों की ओर से रक्तदान के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं होने की बात सामने आई है। बीएचयू और अन्य स्थानों पर आयोजित शिविरों में वहां के छात्र बढ़-चढ़कर रक्तदान करते हैं, लेकिन यहां जागरूकता के बावजूद लोग रक्तदान के लिए आगे नहीं आते। मेडिकल कॉलेज में 500 से अधिक मेडिकल के छात्र और अन्य स्वास्थ्यकर्मी हैं। बावजूद कभी-कभार होने वाले रक्तदान शिविरों में 10 से 12 यूनिट ही रक्तदान हो पाता है।
थैलेसीमिया और अप्लास्टिक एनीमिया के मरीजों को समस्या
थैलेसीमिया से पीड़ित गोलू और निहाल दुबे जैसे बच्चों सहित अप्लास्टिक एनीमिया के कई मरीजों को नियमित रूप से रक्त की आवश्यकता होती है। कुछ मरीजों को हर महीने लगभग 12 यूनिट तक रक्त की जरूरत पड़ती है। जरूरत के समय रक्त उपलब्ध नहीं होने से मरीजों और उनके परिजनों को भटकना पड़ रहा है। छह वर्षीय थैलेसीमिया पीड़ित गोलू का हीमोग्लोबिन 2.9 तक पहुंच गया था। मंडलीय अस्पताल के ब्लड बैंक में रक्त उपलब्ध नहीं होने पर विंध्य फाउंडेशन ट्रस्ट के प्रयास से निजी ब्लड बैंक के माध्यम से उसके लिए एक यूनिट रक्त की व्यवस्था कराई गई।
प्लेटलेट्स की भी कमी
मंडलीय अस्पताल के ब्लड बैंक में रक्त के साथ प्लेटलेट्स की भी कमी है। यहां ए पॉजिटिव और बी पॉजिटिव का एक-एक यूनिट प्लेटलेट्स उपलब्ध है। ए निगेटिव, बी निगेटिव, एबी पॉजिटिव, एबी निगेटिव, ओ पॉजिटिव और ओ निगेटिव समूहों के प्लेटलेट्स उपलब्ध नहीं हैं।
वर्जन
इस समय कुछ रक्त समूहों की कमी है। ओ और बी ग्रुप के रक्त की खपत अधिक होती है। रक्तदान के लिए संस्थाओं से संपर्क किया जा रहा है। जल्द ही रक्तदान शिविर आयोजित कर रक्त की कमी पूरी की जाएगी।
डॉ. राजन, प्रभारी, रक्त केंद्र, मंडलीय अस्पताल
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मिर्जापुर। मंडलीय अस्पताल के ब्लड बैंक में पिछले तीन दिनों से रक्त की कमी बनी हुई है। मरीजों को सबसे अधिक ए, बी और ओ पॉजिटिव ग्रुप की एक भी यूनिट ब्लड नहीं है। इन्हीं ग्रुप की रक्त की सबसे अधिक जरूरत पड़ती है। अस्पताल में भर्ती सामान्य मरीजों के साथ कैंसर, अप्लास्टिक एनीमिया और थैलेसीमिया से पीड़ित मरीजों को भी खून की जरूरत होती है। इन मरीजों को उपलब्धता के आधार पर रक्तदान कराए बिना रक्त उपलब्ध कराया जाता है, लेकिन जरूरी रक्त समूहों का रक्त नहीं होने से मरीजों और उनके परिजनों को भटकना पड़ रहा है। उन्हें निजी ब्लड बैंकों या दूसरे जिलों के रक्त केंद्रों का रुख करना पड़ रहा है।
मंडलीय अस्पताल के ब्लड बैंक की क्षमता 300 यूनिट है, लेकिन यहां कभी 100 यूनिट से अधिक रक्त उपलब्ध नहीं रहता। बड़े रक्तदान शिविरों के बाद ही रक्त की उपलब्धता 100 यूनिट तक पहुंच पाती है। यहां महीने में 300 और साल में लगभग तीन हजार यूनिट रक्त की खपत होती है। इसमें 30 प्रतिशत रक्त बिना रक्तदान कराए दिया जाता है।
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वर्तमान में ब्लड बैंक में सिर्फ दो रक्त समूहों का कुल 12 यूनिट रक्त उपलब्ध है। आठ रक्त समूहों में से ए पॉजिटिव, ए निगेटिव, बी पॉजिटिव, एबी निगेटिव, ओ पॉजिटिव और ओ निगेटिव का एक भी यूनिट रक्त उपलब्ध नहीं है। बी निगेटिव के दो और एबी पॉजिटिव के 10 यूनिट रक्त उपलब्ध हैं। कुल खपत में 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा ए, बी और ओ पॉजिटिव रक्त समूहों का है। इन तीनों समूहों का रक्त उपलब्ध नहीं होने से मरीजों को परेशानी हो रही है।
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मेडिकल कॉलेज के बाद भी रक्तदान के प्रति जागरूकता की कमी
चिकित्सक और स्वास्थ्यकर्मी लोगों को रक्तदान के प्रति जागरूक रहने के लिए प्रेरित करते हैं, लेकिन स्वास्थ्यकर्मियों की ओर से रक्तदान के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं होने की बात सामने आई है। बीएचयू और अन्य स्थानों पर आयोजित शिविरों में वहां के छात्र बढ़-चढ़कर रक्तदान करते हैं, लेकिन यहां जागरूकता के बावजूद लोग रक्तदान के लिए आगे नहीं आते। मेडिकल कॉलेज में 500 से अधिक मेडिकल के छात्र और अन्य स्वास्थ्यकर्मी हैं। बावजूद कभी-कभार होने वाले रक्तदान शिविरों में 10 से 12 यूनिट ही रक्तदान हो पाता है।
थैलेसीमिया और अप्लास्टिक एनीमिया के मरीजों को समस्या
थैलेसीमिया से पीड़ित गोलू और निहाल दुबे जैसे बच्चों सहित अप्लास्टिक एनीमिया के कई मरीजों को नियमित रूप से रक्त की आवश्यकता होती है। कुछ मरीजों को हर महीने लगभग 12 यूनिट तक रक्त की जरूरत पड़ती है। जरूरत के समय रक्त उपलब्ध नहीं होने से मरीजों और उनके परिजनों को भटकना पड़ रहा है। छह वर्षीय थैलेसीमिया पीड़ित गोलू का हीमोग्लोबिन 2.9 तक पहुंच गया था। मंडलीय अस्पताल के ब्लड बैंक में रक्त उपलब्ध नहीं होने पर विंध्य फाउंडेशन ट्रस्ट के प्रयास से निजी ब्लड बैंक के माध्यम से उसके लिए एक यूनिट रक्त की व्यवस्था कराई गई।
प्लेटलेट्स की भी कमी
मंडलीय अस्पताल के ब्लड बैंक में रक्त के साथ प्लेटलेट्स की भी कमी है। यहां ए पॉजिटिव और बी पॉजिटिव का एक-एक यूनिट प्लेटलेट्स उपलब्ध है। ए निगेटिव, बी निगेटिव, एबी पॉजिटिव, एबी निगेटिव, ओ पॉजिटिव और ओ निगेटिव समूहों के प्लेटलेट्स उपलब्ध नहीं हैं।
वर्जन
इस समय कुछ रक्त समूहों की कमी है। ओ और बी ग्रुप के रक्त की खपत अधिक होती है। रक्तदान के लिए संस्थाओं से संपर्क किया जा रहा है। जल्द ही रक्तदान शिविर आयोजित कर रक्त की कमी पूरी की जाएगी।
डॉ. राजन, प्रभारी, रक्त केंद्र, मंडलीय अस्पताल