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गणतंत्र दिवस : खपत देख मिलावटखोर सक्रिय, बीमार न कर दें जश्न के लड्डू
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Sun, 25 Jan 2026 12:22 AM IST
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सिद्धार्थनगर। गणतंत्र दिवस के जश्न पर बांटे जाने वाले लड्डू में मिलावटखोरों ने सेंधमारी शुरू कर दी है। बड़ी मात्रा में इसे खपाने के लिए बाजार में उतारा जा चुका है। स्वाद में मीठा और बाहर से देखने में चमकदार दिखने वाले ये लड्डू असल में मिलावटी बूंदी का गठजोड़ है, जिनमें न तो शुद्ध तेल या घी है और न ही अन्य सामग्री।
सबसे बड़ा खतरा लड्डू में इस्तेमाल होने वाली बूंदी है, जो कई बार हफ्तों पुरानी, केमिकल-रंगी और सस्ते तेल में तली हुई होती है। जांच और निगरानी के अभाव में मिलावटखोर गणतंत्र दिवस पर भी कमाई के लिए जाल बिछा चुके हैं। अगर लोग नहीं चेते तो बाजारों में बिक रहा यह मीठा जहर बीमार बना देगा।
हर तीज-त्योहार पर मिलावटखोर सक्रिय हो जाते हैं। यह बात किसी से छिपी नहीं है। लगातार मिलावटखोरी के मामलों में जब यदा-कदा छापेमारी होती है तो कभी हकीकत भी सामने आ जाती है। अभी पिछले वर्ष ही खाद्य सुरक्षा विभाग ने जिले के तीन स्थानों पर छापेमारी कर 23 किलोग्राम लड्डू का नमूना लिया था। इसकी जांच में पाया गया कि उसमें टार्ट्राजीन, सनसेट येलो जैसे सिंथेटिक फूड कलर मिलाए गए थे। इतना ही नहीं, इसमें सैकरीन की मात्रा भी पाई गई थी, जिसके अधिक सेवन से कुछ लोगों को एलर्जी, सिरदर्द या पाचन संबंधी दिक्कतें हो सकती हैं और यह आंत के माइक्रोबायोम (सूक्ष्मजीवों) को प्रभावित कर सकती है। जिससे मेटाबॉलिक समस्याएं जैसे मोटापा और डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है। हालांकि, कई नियामक संस्थाएं इसके सीमित मात्रा में उपयोग को सुरक्षित भी मानती हैं।
कम लागत में अधिक सप्लाई के लिए रेडिमेड बूंदी: गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर जिले के स्कूलों, सरकारी दफ्तरों और सार्वजनिक आयोजनों में एक साथ लाखों लड्डुओं की मांग होती है। इतनी मात्रा के लड्डुओं की कम समय और कम लागत में ज्यादा सप्लाई देने की होड़ में रेडीमेड बूंदी का सहारा लिया जा रहा है। वही बूंदी जो खुले बोरे में बिना किसी मानक के तैयार की जाती है। ग्राउंड रिपोर्ट में पता चला कि कई स्कूलों में लड्डू की खरीद सबसे कम दर देने वाले सप्लायर से की जा रही है। इसमें निर्माण तिथि की जांच करने वाला कोई नहीं है और न ही सामग्री का ही स्पष्ट विवरण ही देखा जा रहा है।
ऐसे तैयार हो रहा लड्डू: स्थानीय हलवाइयों और थोक सप्लायरों के अनुसार, बड़ी मांग के समय बूंदी पहले से बनाकर स्टोर कर ली जाती है। एक कारीगर ने बताया कि यह बूंदी कई बार रिफाइंड या दोबारा इस्तेमाल किए गए तेल में तली होती है। रसायन विज्ञानी डाॅ. अमरजीत सिंह बताते हैं कि बूंदी में रंग चटख दिखाने के लिए टार्ट्राजीन, सनसेट येलो जैसे सिंथेटिक फूड कलर मिलाए जाते हैं। स्वाद बढ़ाने के लिए सैकरिन का उपयोग होता है।
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सबसे बड़ा खतरा लड्डू में इस्तेमाल होने वाली बूंदी है, जो कई बार हफ्तों पुरानी, केमिकल-रंगी और सस्ते तेल में तली हुई होती है। जांच और निगरानी के अभाव में मिलावटखोर गणतंत्र दिवस पर भी कमाई के लिए जाल बिछा चुके हैं। अगर लोग नहीं चेते तो बाजारों में बिक रहा यह मीठा जहर बीमार बना देगा।
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हर तीज-त्योहार पर मिलावटखोर सक्रिय हो जाते हैं। यह बात किसी से छिपी नहीं है। लगातार मिलावटखोरी के मामलों में जब यदा-कदा छापेमारी होती है तो कभी हकीकत भी सामने आ जाती है। अभी पिछले वर्ष ही खाद्य सुरक्षा विभाग ने जिले के तीन स्थानों पर छापेमारी कर 23 किलोग्राम लड्डू का नमूना लिया था। इसकी जांच में पाया गया कि उसमें टार्ट्राजीन, सनसेट येलो जैसे सिंथेटिक फूड कलर मिलाए गए थे। इतना ही नहीं, इसमें सैकरीन की मात्रा भी पाई गई थी, जिसके अधिक सेवन से कुछ लोगों को एलर्जी, सिरदर्द या पाचन संबंधी दिक्कतें हो सकती हैं और यह आंत के माइक्रोबायोम (सूक्ष्मजीवों) को प्रभावित कर सकती है। जिससे मेटाबॉलिक समस्याएं जैसे मोटापा और डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है। हालांकि, कई नियामक संस्थाएं इसके सीमित मात्रा में उपयोग को सुरक्षित भी मानती हैं।
कम लागत में अधिक सप्लाई के लिए रेडिमेड बूंदी: गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर जिले के स्कूलों, सरकारी दफ्तरों और सार्वजनिक आयोजनों में एक साथ लाखों लड्डुओं की मांग होती है। इतनी मात्रा के लड्डुओं की कम समय और कम लागत में ज्यादा सप्लाई देने की होड़ में रेडीमेड बूंदी का सहारा लिया जा रहा है। वही बूंदी जो खुले बोरे में बिना किसी मानक के तैयार की जाती है। ग्राउंड रिपोर्ट में पता चला कि कई स्कूलों में लड्डू की खरीद सबसे कम दर देने वाले सप्लायर से की जा रही है। इसमें निर्माण तिथि की जांच करने वाला कोई नहीं है और न ही सामग्री का ही स्पष्ट विवरण ही देखा जा रहा है।
ऐसे तैयार हो रहा लड्डू: स्थानीय हलवाइयों और थोक सप्लायरों के अनुसार, बड़ी मांग के समय बूंदी पहले से बनाकर स्टोर कर ली जाती है। एक कारीगर ने बताया कि यह बूंदी कई बार रिफाइंड या दोबारा इस्तेमाल किए गए तेल में तली होती है। रसायन विज्ञानी डाॅ. अमरजीत सिंह बताते हैं कि बूंदी में रंग चटख दिखाने के लिए टार्ट्राजीन, सनसेट येलो जैसे सिंथेटिक फूड कलर मिलाए जाते हैं। स्वाद बढ़ाने के लिए सैकरिन का उपयोग होता है।
