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Sonebhadra News: सर्वे न होता तो 99 पट्टाधारकों के नाम हो जाते दर्ज, जांच शुरू
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सोनभद्र। चतरा ब्लॉक के सोढ़ा गांव में वर्ष 2006 में बांटे गए पट्टों और 2026 में उन्हें मंजूरी दिलाने की कवायद को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। अगर उस समय सर्वे प्रक्रिया बाधा न बनती तो 99 पट्टाधारकों के नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज हो चुके होते। अब 20 साल बाद फाइल खुलने पर अनियमितताओं की परतें सामने आने लगी हैं।
मामला तब सुर्खियों में आया जब कुछ लोगों ने एसडीएम उत्कर्ष द्विवेदी से मिलकर पत्रावली वर्षों से लंबित होने की जानकारी दी। इस पर एसडीएम ने प्रकरण की स्थिति तलब की, लेकिन मौजूदा हाल बताने के बजाय करीब 75 पट्टों के नामांतरण की नोटिंग कर पत्रावली मंजूरी के लिए प्रस्तुत कर दी गई। इससे एसडीएम का संदेह गहराया और जांच शुरू कर दी गई। प्रारंभिक छानबीन में सामने आया कि पट्टा सूची में कई अपात्रों के नाम शामिल किए गए थे। कुछ नाम ग्राम पंचायत प्रतिनिधियों और उनके परिवार के बताए जा रहे हैं, जबकि कई लाभार्थियों के पास पहले से ही पर्याप्त भूमि मौजूद थी। इसके बावजूद उन्हें पात्र दिखाकर सूची में शामिल किया गया।
सूत्रों के अनुसार तत्कालीन लेखपाल, कानूनगो और नायब तहसीलदार की रिपोर्ट के आधार पर पट्टों को स्वीकृति भी मिल गई थी, लेकिन उस समय गांव में सर्वे कार्य चलने के कारण राजस्व रिकॉर्ड में अंकन नहीं हो सका। इसके बाद फाइल दो दशक तक दबाकर रखी गई। फरवरी में अचानक नामांतरण की प्रक्रिया शुरू होते ही मामला अधिकारियों के संज्ञान में आया। एसडीएम उत्कर्ष द्विवेदी ने अब पूरे प्रकरण की विस्तृत रिपोर्ट मांगी है, इसमें लाभार्थियों की वर्तमान स्थिति, जीवित होने की जानकारी और फाइल लंबित रहने के कारण शामिल हैं। एसडीएम का कहना है कि इस मामले में किसी की संलिप्तता साबित होती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई भी की जाएगी।
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मामला तब सुर्खियों में आया जब कुछ लोगों ने एसडीएम उत्कर्ष द्विवेदी से मिलकर पत्रावली वर्षों से लंबित होने की जानकारी दी। इस पर एसडीएम ने प्रकरण की स्थिति तलब की, लेकिन मौजूदा हाल बताने के बजाय करीब 75 पट्टों के नामांतरण की नोटिंग कर पत्रावली मंजूरी के लिए प्रस्तुत कर दी गई। इससे एसडीएम का संदेह गहराया और जांच शुरू कर दी गई। प्रारंभिक छानबीन में सामने आया कि पट्टा सूची में कई अपात्रों के नाम शामिल किए गए थे। कुछ नाम ग्राम पंचायत प्रतिनिधियों और उनके परिवार के बताए जा रहे हैं, जबकि कई लाभार्थियों के पास पहले से ही पर्याप्त भूमि मौजूद थी। इसके बावजूद उन्हें पात्र दिखाकर सूची में शामिल किया गया।
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सूत्रों के अनुसार तत्कालीन लेखपाल, कानूनगो और नायब तहसीलदार की रिपोर्ट के आधार पर पट्टों को स्वीकृति भी मिल गई थी, लेकिन उस समय गांव में सर्वे कार्य चलने के कारण राजस्व रिकॉर्ड में अंकन नहीं हो सका। इसके बाद फाइल दो दशक तक दबाकर रखी गई। फरवरी में अचानक नामांतरण की प्रक्रिया शुरू होते ही मामला अधिकारियों के संज्ञान में आया। एसडीएम उत्कर्ष द्विवेदी ने अब पूरे प्रकरण की विस्तृत रिपोर्ट मांगी है, इसमें लाभार्थियों की वर्तमान स्थिति, जीवित होने की जानकारी और फाइल लंबित रहने के कारण शामिल हैं। एसडीएम का कहना है कि इस मामले में किसी की संलिप्तता साबित होती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई भी की जाएगी।