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Sultanpur News: परचा बनवाने से दवा लेने तक लगे तीन घंटे, जमीन पर बैठकर इंतजार
संवाद न्यूज एजेंसी, सुल्तानपुर
Updated Mon, 23 Mar 2026 11:20 PM IST
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54. मेडिकल कॉलेज में दवा लेने के लिए कतार में खड़े मरीज व तीमारदार। संवाद
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सुल्तानपुर। मेडिकल कॉलेज की ओपीडी सोमवार की सुबह जैसे ही खुली, परचा काउंटर के सामने रजिस्ट्रेशन के लिए मरीजों व तीमारदारों की कतार लग गई। मुख्य गेट से लेकर पंजीयन काउंटर तक लंबी कतारें नजर आईं। कई मरीज हाथ में परचा लिए इधर-उधर भटकते दिखे, तो कई जमीन पर बैठकर अपनी बारी का इंतजार करते रहे।
सुबह करीब 10 बजे तक हालात यह हो गए कि पंजीयन काउंटर के बाहर लोगों की लंबी लाइन लग गई। एक-एक परचा बनवाने में 20-25 मिनट लग रहे थे। इसके बाद डॉक्टर को दिखाने के लिए अलग कतार और फिर दवा काउंटर पर नई लाइन, हर चरण पर मरीजों की परीक्षा होती रही। पुरुष अस्पताल में सोमवार को 2370 नए मरीजों ने पंजीयन कराया, जबकि करीब 1500 पुराने मरीज भी पहुंचे। भीड़ इतनी ज्यादा थी कि अस्पताल के बरामदों में पैर रखने तक की जगह नहीं बची। बुजुर्ग मरीज दीवार का सहारा लेकर खड़े रहे, जबकि महिलाएं बच्चों को गोद में लिए लाइन में जूझती दिखीं। जांच काउंटर पर हालात और खराब थे। पहले पंजीयन, फिर सैंपल वायल लेने के लिए अलग कतार, इस दोहरी प्रक्रिया में मरीजों को घंटों इंतजार करना पड़ा। जांच कराने आए करुणा शंकर और शिव सहाय विश्वकर्मा ने थककर जांच ही टाल दी और बाहर जांच कराने के लिए चले गए।
मरीजों और तीमारदारों का कहना था कि दो दिन की छुट्टी के बाद भीड़ बढ़ना तय था, लेकिन अस्पताल प्रशासन ने न तो अतिरिक्त काउंटर बढ़ाए और न ही स्टाफ। नतीजा यह रहा कि इलाज से ज्यादा समय लाइन में ही निकल गया।
सुबह आए, दोपहर में मिली दवा
रामरती बताती हैं कि वह बेटे के साथ सुबह 10 बजे पहुंचीं। परचा बनवाने और डॉक्टर को दिखाने के बाद दवा लेने में दो घंटे से ज्यादा लग गए। वहीं, राम शब्द ने कहा कि 11 बजे से कतार में खड़े हैं, लेकिन दोपहर तक भी दवा नहीं हो मिल सकी।
इमरजेंसी की हकीकत: ई-रिक्शा बना स्ट्रेचर
अस्पताल में स्ट्रेचर की कमी खुलकर सामने आई। एक गंभीर मरीज को जब स्ट्रेचर नहीं मिला तो परिजन उसे ई-रिक्शा से ही इमरजेंसी तक ले गए। इससे न सिर्फ व्यवस्था पर सवाल उठे, बल्कि अन्य मरीजों को भी परेशानी का सामना करना पड़ा।
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सुबह करीब 10 बजे तक हालात यह हो गए कि पंजीयन काउंटर के बाहर लोगों की लंबी लाइन लग गई। एक-एक परचा बनवाने में 20-25 मिनट लग रहे थे। इसके बाद डॉक्टर को दिखाने के लिए अलग कतार और फिर दवा काउंटर पर नई लाइन, हर चरण पर मरीजों की परीक्षा होती रही। पुरुष अस्पताल में सोमवार को 2370 नए मरीजों ने पंजीयन कराया, जबकि करीब 1500 पुराने मरीज भी पहुंचे। भीड़ इतनी ज्यादा थी कि अस्पताल के बरामदों में पैर रखने तक की जगह नहीं बची। बुजुर्ग मरीज दीवार का सहारा लेकर खड़े रहे, जबकि महिलाएं बच्चों को गोद में लिए लाइन में जूझती दिखीं। जांच काउंटर पर हालात और खराब थे। पहले पंजीयन, फिर सैंपल वायल लेने के लिए अलग कतार, इस दोहरी प्रक्रिया में मरीजों को घंटों इंतजार करना पड़ा। जांच कराने आए करुणा शंकर और शिव सहाय विश्वकर्मा ने थककर जांच ही टाल दी और बाहर जांच कराने के लिए चले गए।
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मरीजों और तीमारदारों का कहना था कि दो दिन की छुट्टी के बाद भीड़ बढ़ना तय था, लेकिन अस्पताल प्रशासन ने न तो अतिरिक्त काउंटर बढ़ाए और न ही स्टाफ। नतीजा यह रहा कि इलाज से ज्यादा समय लाइन में ही निकल गया।
सुबह आए, दोपहर में मिली दवा
रामरती बताती हैं कि वह बेटे के साथ सुबह 10 बजे पहुंचीं। परचा बनवाने और डॉक्टर को दिखाने के बाद दवा लेने में दो घंटे से ज्यादा लग गए। वहीं, राम शब्द ने कहा कि 11 बजे से कतार में खड़े हैं, लेकिन दोपहर तक भी दवा नहीं हो मिल सकी।
इमरजेंसी की हकीकत: ई-रिक्शा बना स्ट्रेचर
अस्पताल में स्ट्रेचर की कमी खुलकर सामने आई। एक गंभीर मरीज को जब स्ट्रेचर नहीं मिला तो परिजन उसे ई-रिक्शा से ही इमरजेंसी तक ले गए। इससे न सिर्फ व्यवस्था पर सवाल उठे, बल्कि अन्य मरीजों को भी परेशानी का सामना करना पड़ा।

54. मेडिकल कॉलेज में दवा लेने के लिए कतार में खड़े मरीज व तीमारदार। संवाद