मालिनी अवस्थी का छलका दर्द: महामना दान लेने नहीं आए दालमंडी तो कोठे की तवायफों ने भिजवाए कड़े-जेवर
Varanasi News: बनारस लिट फेस्ट 2026 में रंगकर्मी व्योमेश शुक्ल के साथ संवाद करते हुए लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने कहा कि बीएचयू की स्थापना के लिए महामना दान लेने दालमंडी नहीं आए तो कोठे की तवायफों ने अपने कड़े-जेवर के साथ उन्हें एक पत्र भिजवाए।
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दालमंडी सहित बनारस की परंपरागत लोक महफिल गायकी खत्म होने पर बनारस लिट फेस्ट 2026 में लोक गायिका मालिनी अवस्थी का दर्द छलका। रंगकर्मी व्योमेश शुक्ल के साथ संवाद करते हुए मालिनी ने कहा कि बीएचयू की स्थापना के निए दरभंगा से लेकर राजस्थान तक महामना को दान देने की होड़ लगी थी। एक दिन महामना चौक से होकर दशाश्वमेध घाट तक लोगों से दान लेते हुए निकले। बीच में दालमंडी में गायिकाएं उनका इंतजार करती रहीं लेकिन महामना वहां नहीं गए। गायिकाओं को बेइज्जती महसूस हुई।
इसके बाद उन सभी गायिकाओं ने खिदमतगारों से अपने स्वर्ण कड़े और जेवर के साथ महामना को पत्र भिजवाया। दुलारी बाई ने महामना को लिखा कि आप हमारी तरफ नहीं आए, कोई बात नहीं। लेकिन, हम पढ़े लिखे होते तो हमारे नसीब में दालमंडी का कोठा नहीं होता। आपके इस पुण्य प्रयास से बनारस की बेटियां गाएं-बजाएं और संगीत के क्षेत्र में अपना नाम करें, इसके लिए हमसे जो कुछ हो सका हम न्योछावर कर रहे हैं। ये काशी की गायिकाओं की परंपरा रही है।
मालिनी अवस्थी ने कहा कि मैं तो बैठी और खड़ी दोनों महफिलें करती हूं। गाती और नाचती भी हूं। अभी एमपी राजभवन में प्रस्तुति देकर आई। मेरी 40 साल की लड़ाई इसी इज्जत के खिलाफ रही है। आज आप बेगम अख्तर को सुनकर आह और वाह करते हैं लेकिन उन गायिकाओं को किस नजर से देखते हैं।
मजा हुस्न का आंखों से लीजिए... सुनना क्यों अश्लील नहीं
मालिनी अवस्थी ने कहा कि आजादी के बाद 1952 में संस्कृति मंत्री ने कानून लाकर तवायफों के रेडियो पर गाना गाने पर प्रतिबंध लगा दिया। उस संगीत का चलन बंद हो गया। इनको अश्लील बोला गया, लेकिन अभिनेत्रियां आज की रात मजा हुस्न का आंखों से लीजिए... जैसे गीत पर नाच रही हैं और माता-पिता भी खुश हैं। संगीत को लेकर सोच बड़ी करनी होगी। 1940 में अंग्रेजी सरकार में ये प्रतिबंध लगाया गया था, लेकिन आजादी के बाद उस संगीत के अवशेष ही नहीं बचे। इसके बाद तो उनकी प्रतिष्ठा और पहचान का संकट हो गया। लखनऊ के चौक और दालमंडी में इसके अवशेष भी नहीं हैं।
मालिनी अवस्थी ने एक और पुराना जिक्र छेड़ा। बताया कि नैना बाई भारतेंदु का पद गा रहीं थीं तो उसे सुनने खुद भारतेंदु आए थे। उन्होंने कहा कि आपके भाव अच्छे नहीं हैं। भारतेंदु ने उनका घुंघरू मांगा, फिर गाकर अपने भाव दिखाए, तब नैना बाई ने पैर छू लिए। ये बनारस के सुधि श्रोता और बिना अहंकार के कला का संगम था।
गांधी जी ने कहा: संगीत रसिकों का मन बहलाना बंद करिये
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जिनका दिल नहीं टूटा वे क्या गाएंगे ठुमरी
ठुमरी गाना आसान नहीं। भाव, रस और प्रेम में दिल नहीं टूटा है और जलालत नहीं सही तो ठुमरी दादरा असर नहीं कर सकती। आज लोकगीतों को गाने वालों का नाम कोई नहीं जानता। बनारस की ठुमरी को समझना है तो चार कंठ साधक रसूलन बाई, सिद्धेश्वरी देवी, गिरिजा देवी और महादेव मिश्र को सुनना ही होगा। मैं भारतेंदु की कजरी और सखी संप्रदाय की रचनाएं गाती हूं। इनके अलावा काशी बाई, हुस्ना बाई, विद्याधरी बाई, दुलारी बाई बनारस की लोक गायिकाएं रहीं।
