BHU: सेमेस्टर परीक्षा में पूछा-ब्राह्मणवादी पितृसत्ता ने प्राचीन भारत में महिलाओं की प्रगति में कैसे बाधा डाली
Varanasi News: बीएचयू की एमए इतिहास परीक्षा में “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” पर पूछे गए सवाल को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। कुछ इतिहासकारों ने इसे अनुचित और समाज में वैमनस्य बढ़ाने वाला बताया, जबकि विश्वविद्यालय प्रशासन ने कहा कि प्रश्न निर्धारित पाठ्यक्रम के दायरे में और शैक्षणिक संदर्भ में पूछा गया है।
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ब्राह्मणवादी पितृसत्ता शब्द से आप क्या समझते हैं? चर्चा कीजिए कि किस प्रकार ब्राह्मणवादी पितृसत्ता ने प्राचीन भारत में महिलाओं की प्रगति में बाधा डाली। यह सवाल बीएचयू की ओर से आयोजित सेमेस्टर परीक्षा में पूछा गया है। एमए इतिहास के चौथे सेमेस्टर के ‘आधुनिक भारतीय समाज में महिलाएं’ विषय के पेपर में यह प्रश्न आया है।
यह परीक्षा सामाजिक विज्ञान संकाय के इतिहास विभाग की थी। तीन घंटे के इस पेपर में कुल 70 अंकों के तीन सेक्शन में सवाल पूछे गए हैं। इसमें चार सवाल वैकल्पिक, तीन सवाल लघु उत्तरीय और दो सवाल दीर्घ उत्तरीय थे। इतिहासकारों का मानना है कि ब्राह्मणवादी पितृसत्ता एक एकेडमिक शब्द रहा है, लेकिन आज के समय में इसका इस्तेमाल करना अफसोसजनक है।
ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को लेकर इतिहासकारों का मत
क्या यह शब्द संविधान में दर्ज है : प्रो. हेरंब
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इतिहासकार प्रो. हेरंब चतुर्वेदी के अनुसार, क्या यह शब्द संविधान में दर्ज है, जिससे लोगों को दूर रहना है? इसे प्राचीन इतिहास पर थोप देना उचित नहीं है। इस तरह का सवाल ही नहीं होना चाहिए। इतिहासकार योगेंद्र सिंह इसे संस्कृतिकरण कहते हैं। ब्राह्मणवाद शब्द को मध्यकाल के कवियों ने ध्वस्त कर दिया है।
90 के दशक में प्रचलित हुआ यह शब्द : प्रो. अनुराधा सिंह
इतिहास विभाग की प्रो. अनुराधा सिंह के अनुसार, शब्द कालखंड, स्थान और परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहते हैं। ब्राह्मणवादी पितृसत्ता जैसे शब्द का आज के समय में इस्तेमाल करना अनुचित है। यह शब्द 90 के दशक में प्रचलित होना शुरू हुआ था। प्राचीन काल में महिलाओं की क्या स्थिति थी, उसका आकलन अब करना आपसी भेदभाव को बढ़ावा देगा। प्राचीन काल में यदि कहीं महिलाओं की स्थिति खराब थी, तो उससे पूरे भारतवर्ष का मूल्यांकन नहीं करना चाहिए। यह बिल्कुल गलत है। मैं नहीं मानती कि उस काल में स्थिति इतनी खराब थी कि उस पर सवाल पूछा जाए या कक्षा में पढ़ाया जाए। इससे समाज में वैमनस्यता बढ़ेगी।
समय बदला है तो शब्द भी बदल रहे : प्रो. प्रवेश भारद्वाज
हाल ही में इतिहास विभाग के अध्यक्ष बने प्रो. प्रवेश भारद्वाज ने कहा कि समय बदला है तो शब्द भी बदल रहे हैं। उच्च वर्ग के किसी समारोह में नाऊ, मेहतर आदि को पहले निकाला जाता था। आगे-आगे साफा लगाकर नाऊ चलता था और ललकार कर आह्वान करता था। एक पक्ष को संतुष्ट करने में दूसरे को असंतुष्ट नहीं किया जा सकता।
उस पेपर के अन्य सवाल
वैकल्पिक सेक्शन में पूछा गया कि मुगलकालीन भारत में हरमों की क्या भूमिका थी। गेरडा लर्नर की किताब ‘क्रिएशन ऑफ पितृसत्ता’ के मुख्य तर्क क्या थे। यह किताब मेसोपोटामिया में महिलाओं की प्रताड़ना से जुड़ी है।
दीर्घ उत्तरीय सेक्शन में पूछा गया कि औपनिवेशिक काल यानी अंग्रेजी शासन में भारतीय महिलाओं के लिए किस प्रकार के अलग-अलग शैक्षिक अवसर खुले। ये उनके निजी और सार्वजनिक जीवन के अंतर को तोड़ने में कितने प्रभावी थे।
निर्धारित पाठ्यक्रम के दायरे में पूछा सवाल : बीएचयू
इस मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन ने आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा है कि यह प्रश्न परीक्षा के निर्धारित पाठ्यक्रम के दायरे में ही पूछा गया है और शैक्षणिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया गया है। इस संबंध में किसी भी प्रकार के विवाद को जन्म देना उचित नहीं है।