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Holi: होली और काशी दोनों का मेल धरती का सबसे अल्हड़ और मनमौजी का दिन होगा, इनसे जानें त्योहार का मिजाज

अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Wed, 04 Mar 2026 08:52 AM IST
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सार

Varanasi News: काशी के पंडित राजेश्वर आचार्य, व्योमेश शुक्ल, प्रो. सदानंद शाही ने होली को लेकर अपनी-अपनी कहानियां दिलचस्प तरीके से बताई। इनके मिजाज से रंगों को त्योहार कैसा था, यह जानने लायक है।

combination of Holi and Kashi most carefree and whimsical day on earth mood of festival
प्रो. सदानंद शाही, पंडित राजेश्वर आचार्य और व्योमेश शुक्ल। - फोटो : संवाद
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विस्तार

Holi: होली और काशी में कौन सबसे ज्यादा अल्हड़ मस्ती से भरपूर है ये कहना मुश्किल है, मगर दोनों जब एक साथ मिल जाएं तो वह धरती का सबसे मनमौजी दिन होगा। काशी में रचे-बसे पंडित राजेश्वर आचार्य, व्योमेश शुक्ल, प्रो. सदानंद शाही की बातों से काशी की होली का मिजाज झलक रहा है। इनकी कहानियों में कहीं काशी की मारधाड़ वाली मुक्की होली के अंग्रेज अफसर भी मुरीद थे। 30 साल पहले तक दुर्गाघाट पर खेलते हुए देखा गया था। कभी बिरला हॉस्टल के स्नातक छात्र ने कुलपति नरेंद्र देव की सिर्फ मूंछ रंग दी। वह छात्र केदारनाथ सिंह थे जो बाद में  ख्यात साहित्यकार हुए। 

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कुलपति को केदारनाथ के आगे झुककर मूंछ पर लगवानी पड़ी अबीर
साहित्यकार और बीएचयू के पूर्व प्रोफेसर प्रो. सदानंद शाही ने बताया कि होली पर मेरे गुरु केदारनाथ सिंह का एक किस्सा है। बीएचयू के कुलपति आचार्य नरेंद्र देव थे। केदारनाथ सिंह बीए में प्रवेश लिए थे और बिरला हास्टल में रहते थे। उनके मन में भी कुलपति के साथ होली खेलने की इच्छा फूटी। कुलपति निवास पर मुट्ठी में रंग और अबीर लिए पहुंचे। जब सीनियरों की टोली निकल गई तो आचार्य नरेंद्र देव की निगाह केदारनाथ सिंह पर पड़ी।

बोले, अरे तुम वहां कैसे खड़े हो ? तो इन्होंने बहुत संकोच के साथ कहा कि आपके साथ होली खेलनी है। तब तक नीचे से ऊपर तक आचार्य नरेंद्र देव अबीर गुलाल से रंग गए थे। उन्होंने केदारनाथ सिंह से कहा - देखो भाई अब तो नीचे से ऊपर तक मेरा कुर्ता, धोती सब रंग चुका है। कोई जगह खाली दिखे तो बताओ ? बेशक तुम वहां अपना अबीर गुलाल लगा लो।

संकोच के साथ केदारनाथ ने आचार्य की सफेद धवल बड़ी मूंछों की ओर इशारा किया। आचार्य जी मुस्कुराये और बोले - लगा लो। लेकिन अब समस्या यह है कि छोटे से केदारनाथ सिंह और लंबे आचार्य नरेंद्र देव। अब कैसे उनके हाथ मूंछों तक पहुंचे और वो उसमें अबीर गुलाल लगायें। केदार जी बताते थे कि आचार्य नरेंद्र देव झुक गए और कहा कि लो! तब इतने बड़े लोग विश्वविद्यालय के कुलपति इतने सहज हुआ करते थे। 

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दो पहलवानों के बीच दुर्गाघाट पर होता था मारधाड़, न कचहरी, न थाना-पुलिस
नागरीप्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने बताया कि तीन दशक पहले तक काशी के दुर्गाघाट पर मुक्की वाली होली होती थी। दो पहलवानों के बीच जमकर मारपीट का एक जोखिम भरा खेल था, जो सिर्फ होली पर ही होता था। ये मारपीट न कभी थाने-पुलिस-कचहरी और न ही प्राथमिकी तक नहीं पहुंची। खेल में कितनी भी हिंसा हो, वह स्थायी दुश्मनी में नहीं बदलती थी।

अंग्रेजों के जमाने में बनारस के पुलिस कप्तान मिस्टर ब्रामले बहुत कौतुक के साथ एक बार यह खेल देखने गए और इस खेल के मुरीद हो गए। उन्होंने आदेश दिया कि इस खेल को न रोका जाए, क्योंकि इससे कानून-व्यवस्था को कोई नुकसान नहीं होता। अलबत्ता छेड़छाड़, विजया-सेवन और रसरंजन की बैठकें जमती हैं और उनमें भी हाहाकारी व्यय नहीं होता।

यह त्योहार बहुत प्रजातांत्रिक है। मेहमान आते हैं। लेकिन उपहारों, मिठाइयों और आतिशबाजी के खर्चे से जेब ढीली नहीं होती। इसमें दीवाली की तरह स्त्रियों को घर की सफाई नहीं करनी पड़ती। आज से 20-25 साल पहले भी हमारे लिए मां के हाथ से बने व्यंजन ही सबसे महंगे होली गिफ्ट होते थे।

होली के हुड़दंग में बीएचयू के छात्रों से मारपीट हुई तो क्षमा मांगने महामना नंगे पांव पहुंचे अस्सी
उतर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के पूर्व अध्यक्ष पद्मश्री पं. राजेश्वर आचार्य ने बताया कि काशी में आनंद का आचमन करने का पर्व होली है। कुछ गलतियां हो जाएं तो दूसरों से क्षमा मांगने में भी कोई गुरेज नहीं। ये संस्कार महामना से मिला है। मेरे पिता और महामना के समय प्रोफेसर रहे पंडित पद्मनारायण आचार्य ने होली पर महामना की एक कहानी सुनाई थी।

बताया कि अस्सी पर होली का हुड़दंग हो रहा था। एक बड़े नागा साधु हरिहर बाबा का नाव कई वर्षों से वहां पर खड़ी रहती थी। बीएचयू के छात्रों के रंग का कुछ छींटा नाव पर साधना कर रहे बाबा पर चला गया। इससे विवाद हो गया। इस पर छात्रों ने नाव पर ढेला मारना शुरू कर दिया। साथ ही नाव को गंगा में चला दिया।  शिष्यों और छात्रों में झगड़ा बढ़ गया।

महामना को पता चला तो वह विश्वविद्यालय से नंगे पांव दौड़कर अस्सी पहुंचे और वहां पर पड़े कीचड़ में लेटकर बाबा से क्षमा मांगी और कहा कि मेरे बच्चों पर कोप मत करिएगा। मेरे बच्चे नादान हैं। इनको माफ कर दो प्रभु। फिर हरिहर बाबा बहुत प्रसन्न हुए और हंसते हुए कहा कि जिनके अभिभावक ऐसे विशाल हृदय हो उनके विद्यार्थियों को आशीर्वाद ही मिलेगा। यह था होली पर उदारता क्षमा संस्कार के समन्वय का अद्भुत स्मरणीय प्रसंग।

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