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न्याय की कीमत: गवाही के पांच रुपये, महंगाई 2026 की, भत्ता 1976 का; कोर्ट आने वाले गवाहों की सूची लंबी
रवि प्रकाश सिंह, संवाद न्यूज एजेंसी, वाराणसी।
Published by: प्रगति चंद
Updated Fri, 20 Feb 2026 12:30 PM IST
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सार
Varanasi News: न्याय व्यवस्था में गवाह ही सबसे अहम कड़ी हैं। इसके बावजूद अदालत में गवाही देने के लिए भत्ता वही है जब आज के 50 साल पहले बनी।
Court
- फोटो : AI
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विस्तार
अदालत में गवाही देने आइए, दिन भर वक्त दीजिए, धमकियां झेलिये और बदले में पाइए सिर्फ पांच रुपये। 50 साल पहले बनी उत्तर प्रदेश परिवादी और साक्षी दंड न्यायालय व्यय भुगतान नियमावली आज भी जस की तस है। 2.63 लाख आपराधिक मामलों के बोझ तले दबी न्याय व्यवस्था में गवाह ही सबसे अहम कड़ी हैं, लेकिन उसकी कीमत आज भी चाय समोसे से कम है। सरकारी गवाह तो विभाग से टीए डीए लेते हैं, लेकिन सामान्य गवाहों ने इस तरफ ध्यान देना ही छोड़ दिया है। पांच से आठ रुपये के लिए कौन समय बर्बाद करे। बता दें कि किसी ना किसी मामले में रोज 30-35 गवाह कचहरी आते हैं।
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अदालत में गवाही देने के लिए भत्ता वही है जब आज के 50 साल पहले उत्तर प्रदेश परिवादी एवं साक्षी दंड न्यायालय व्यय भुगतान नियमावली 1976 बनी। उत्तर प्रदेश में गवाही देने आने वाले आम लोगों को सरकार की ओर से मिलने वाला भत्ता आज भी 1976 के नियमों पर चल रहा है। इन वर्षों में महंगाई करीब 15 गुना बढ़ी है, लेकिन गवाहों को आज भी अच्छी चाय से भी कम पैसे में दिन गुजारना पड़ता है।
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नियमों के मुताबिक सामान्य गवाह को अदालत आने-जाने के लिए सेकंड क्लास ट्रेन किराया और केवल 5 या आठ रुपये प्रतिदिन खाना भत्ता दिया जाता है। वहीं, विशेष गवाह को फर्स्ट क्लास किराया दिया जाता है। अधिवक्ता मिलिंद श्रीवास्तव ने कहा कि पूरी कानूनी प्रक्रिया जिस गवाह की बदौलत पूरी होती है उसे आज के समय में पांच से दस रुपये मिलना न केवल चिंता का विषय है बल्कि शासन को इस दिशा में सुधार की जरूरत है।
गवाह न्याय प्रक्रिया की अहम कड़ी
किसी भी अपराध चाहे वह हत्या हो या मारपीट को समाज के विरुद्ध किया गया कृत्य माना जाता है। इसीलिए दंड प्रक्रिया में अपराध को सिद्ध करने का भार राज्य यानी अभियोजन पर होता है। पुलिस, सरकारी वकील, अदालत पूरी सरकारी मशीनरी इसी उद्देश्य से कार्य करती है। निचली अदालतों में स्थायी अभियोजन अधिकारी और सत्र न्यायालयों में सरकारी अधिवक्ता नियुक्त होते हैं। जब साक्ष्य का दौर शुरू होता है, तो अदालतें गवाहों को समन भेजती हैं और अनुपस्थित रहने पर गैर-जमानती वारंट तक जारी किए जाते हैं। अधिवक्ता नित्यानंद राय बताते है कि गवाह जैसे पुलिसकर्मी है तो विभाग से टीए, डीए पा लेते हैं, लेकिन आम नागरिक गवाहों को हर पेशी पर अपनी जेब से खर्च करना पड़ता है। हैरानी की बात यह है कि पूरा मुकदमा इन्हीं गवाहों की गवाही पर टिका होता है, फिर भी उनके लिए व्यवस्था लगभग शून्य है। भत्ते के नियमावली के अनुसार गवाह को पहले अदालत में आवेदन देना पड़ता है। फिर सरकारी वकील उसकी संस्तुति करता है, उसके बाद न्यायालय की अनुमति मिलती है और अंत में नजारत से भुगतान होता है। यह पूरी प्रक्रिया इतनी जटिल और समय साध्य है कि अधिकांश गवाह दावा ही नहीं करते।