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काशी में विदेशी का अंतिम संस्कार: गाजे-बाजे के साथ निकली शवयात्रा, कनाडा एंबेसी से आया लेटर; जानें मामला

अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Wed, 22 Apr 2026 09:03 AM IST
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सार

Varanasi News: टारस की कहानी काशी की उस आध्यात्मिक छवि को भी दर्शाती है, जहां दुनिया के अलग-अलग कोनों से लोग शांति और आत्मिक संतोष की तलाश में आते हैं। अंततः एक विदेशी नागरिक ने इसी नगरी में अपने जीवन की अंतिम सांस ली और हिंदू रीति-रिवाज के साथ उनकी अंतिम विदाई हुई।

Foreigner Funeral in Kashi Funeral Procession Held with Pomp and Music Letter Received Canadian Embassy
टारस के साथ अमन कबीर और एंबेसी से आया लेटर। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

Varanasi News: काशी में एक विदेशी नागरिक की जीवन यात्रा और अंतिम पड़ाव की कहानी सामने आई है। कनाडा के नागरिक टारस तनास्सोव अगस्त महीने में पारिवारिक विवाद के बाद वाराणसी पहुंचे थे। काशी आने के बाद उन्होंने गंगा घाटों पर समय बिताना शुरू किया और धीरे-धीरे यहीं की जीवनशैली में रम गए।

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बताया जाता है कि बीते गुरुवार को मणिकर्णिका घाट पर उन्होंने अंतिम सांस ली। उनकी मौत के बाद स्थानीय समाजसेवी अमन कबीर और उनकी संस्था अमन कबीर सेवा न्यास ट्रस्ट ने पहल करते हुए उनके परिजनों से संपर्क साधा। परिवार से सहमति मिलने के बाद कनाडा एंबेसी की ओर से अंतिम संस्कार की अनुमति का पत्र जारी किया गया।
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मंगलवार को टारस का अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाज के साथ मणिकर्णिका घाट पर किया गया। इस दौरान ट्रस्ट के सदस्यों ने पूरे विधि-विधान से उनकी अंतिम यात्रा संपन्न कराई।

गाजे-बाजे के साथ निकली शवयात्रा

टारस तनास्सोव के जीवन के बारे में कई रोचक बातें भी सामने आई हैं। उन्होंने दो शादियां की थीं। मंगलवार की शाम उनकी पहली पत्नी एलेन ने अमन कबीर से वीडियो कॉल पर बातचीत की। एलेन ने बताया कि अगस्त महीने में पारिवारिक विवाद के चलते टारस घर छोड़कर काशी चले गए थे। यहां आने के बाद उन्हें गंगा घाटों पर एक अलग तरह की शांति का अनुभव हुआ और उन्होंने साधना करना शुरू कर दिया।

स्थानीय लोगों के अनुसार, टारस की लंबी जटाएं और साधु जैसी वेशभूषा के कारण वह एक सन्यासी की तरह दिखाई देते थे। घाटों पर रहने के दौरान वह जरूरतमंद लोगों की मदद भी करते थे और कई बार आर्थिक सहायता तक प्रदान करते थे।

हालांकि, समय के साथ उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। वे एक गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। उनका इलाज मंडलीय अस्पताल में भी कराया गया, लेकिन स्वास्थ्य में सुधार नहीं हो सका। इस बात की पुष्टि अमन कबीर ने भी की है।

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