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गेमिंग कल्चर में उलझी जेन जी: पूर्वांचल के मैदान तलाश रहे खिलाड़ी, पारंपरिक खेलों को बचाने की चुनौती

Tue, 04 Aug 2026 11:01 AM IST
Pragati Chand रोहित चतुर्वेदी, अमर उजाला ब्यूरो, वाराणसी।
रोहित चतुर्वेदी, अमर उजाला ब्यूरो, वाराणसी। Published by: Pragati Chand Updated Tue, 04 Aug 2026 11:01 AM IST
सार

पूर्वांचल के मैदान अब खिलाड़ियों का इंतजार कर रहे हैं। यहां कबड्डी, गिल्ली-डंडा और दंगल जैसी परंपराएं बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है। हालांकि गांवों में अब भी विरासत जिंदा है। पूर्वांचल के कई लोकप्रिय पारंपरिक खेल त्योहारों और मेलों तक सिमटे हैं।
 

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Gen Z Caught Up in Gaming Culture Players from Purvanchal Seeking Playing Fields including Varanasi
खेल विशेषज्ञों ने जताई चिंता - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अंगूठों की तेजी अब मोबाइल स्क्रीन पर दिखती है जबकि कभी यही फुर्ती गांव के मैदानों में कबड्डी के दांव, गिल्ली-डंडा की चोट और खो-खो की दौड़ में नजर आती थी। जेन जी गेमिंग कल्चर में उलझी है और पूर्वांचल के मैदान अपने खिलाड़ियों का इंतजार कर रहे हैं। खेल विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि अभी प्रयास नहीं हुए तो नई पीढ़ी इन खेलों को केवल किताबों और सोशल मीडिया की रीलों में ही देख पाएगी।

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गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर, महाराजगंज, बलिया, गाजीपुर, मऊ, आजमगढ़, जौनपुर, वाराणसी और चंदौली समेत पूर्वी उत्तर प्रदेश के अधिकांश जिलों में कबड्डी, खो-खो, गिल्ली-डंडा, कंचे, पिट्ठू, रस्साकशी और कुश्ती कभी ग्रामीण जीवन की पहचान हुआ करते थे। 
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शाम होते ही गांव के खाली मैदान बच्चों और युवाओं से भर जाते थे लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। स्मार्टफोन की आसान पहुंच, ऑनलाइन गेमिंग और पढ़ाई के बढ़ते दबाव के कारण बच्चों का मैदान से रिश्ता कमजोर हुआ है। हालांकि, कई ग्राम पंचायतें और सामाजिक संगठन भी स्थानीय खेल प्रतियोगिताएं करवाकर युवाओं को मैदान तक लाने का प्रयास कर रहे हैं। खेल प्रशिक्षकों का कहना है कि यदि पारंपरिक खेलों को स्कूल स्तर की प्रतियोगिताओं और ग्राम स्तरीय खेल महोत्सवों से जोड़ा जाए तो इनकी लोकप्रियता दोबारा लौट सकती है।

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रील से रियल गेम तक का सफर...
पूर्व अंतरराष्ट्रीय भारोत्तोलक स्वाति सिंह कहती हैं, जेन-जी की दुनिया में गेमिंग अब सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक ट्रेंड बन चुकी है। ऑनलाइन मल्टीप्लेयर गेम्स में घंटों बिताने वाले युवाओं के लिए असली चुनौती अब मैदान में लौटने की है। विशेषज्ञों का कहना है कि वर्चुअल गेम रणनीति सिखाते हैं, लेकिन कबड्डी, खो-खो और पिट्ठू जैसे खेल शरीर और दिमाग दोनों को एक साथ सक्रिय रखते हैं। इन खेलों में टीमवर्क, नेतृत्व, त्वरित निर्णय और फिटनेस का ऐसा मेल मिलता है, जो स्क्रीन पर संभव नहीं। यही वजह है कि कई स्कूल अब डिजिटल और आउटडोर गतिविधियों के बीच संतुलन बनाने पर जोर दे रहे हैं।

पूर्वांचल की पहचान हैं ये देसी खेल
तीन दशक से अधिक समय से खेल से जुड़े वॉलीबॉल के राष्ट्रीय स्तर के रेफरी प्रताप शंकर दुबे कहते हैं कि पूर्वांचल के गांवों में कबड्डी, खो-खो, गिल्ली-डंडा, कंचे, पिट्ठू, रस्साकशी और कुश्ती वर्षों से सामाजिक जीवन का हिस्सा रहे हैं। नागपंचमी के दंगल, मेलों की कबड्डी प्रतियोगिताएं और गांवों की चौपाल पर गिल्ली-डंडा कभी सामान्य दृश्य थे। इन खेलों की खासियत यह है कि इनमें महंगे उपकरण नहीं लगते और हर उम्र के लोग हिस्सा ले सकते हैं।

पारंपरिक खेल हमारी खेल संस्कृति की जड़ हैं। कबड्डी, खो-खो और गिल्ली-डंडा जैसे खेल बच्चों में निर्णय लेने की क्षमता, नेतृत्व और टीम भावना विकसित करते हैं। यदि स्कूलों और पंचायतों के स्तर पर नियमित प्रतियोगिताएं कराई जाएं तो नई पीढ़ी का रुझान फिर इन खेलों की ओर बढ़ सकता है। -डॉ. एके सिंह, चेयरमैन, यूपी एडवेंचर स्पोर्ट्स क्लब
मोबाइल और गेमिंग अपनी जगह हैं, लेकिन शारीरिक विकास का विकल्प नहीं बन सकते। मैदान में खेलने से फिटनेस, आत्मविश्वास और सामाजिक जुड़ाव बढ़ता है। बच्चों को हर दिन कुछ समय आउटडोर खेलों के लिए देना चाहिए। यही भविष्य के खिलाड़ियों की पहली पाठशाला है
-राहुल सिंह, पूर्व हॉकी ओलंपियन

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