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IIT BHU: नई तकनीक...9 पैसे में प्रति लीटर पानी से निकालेगा खतरनाक रसायन और रंग, जानें शोषक पदार्थ के बारे में

अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Sat, 10 Jan 2026 06:11 AM IST
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सार

Varanasi News: भारत सरकार ने आईआईटी बीएचयू को इस एडसोर्बेंट सामग्री और इसकी निर्माण विधि दोनों के लिए पेटेंट दिया है।

IIT BHU New technology remove harmful chemicals dyes from water for just 9 paise per liter
IIT BHU - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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IIT BHU: उद्योगों से निकलने वाले रासायनिक दूषित जल को साफ करने के लिए आईआईटी बीएचयू ने एक नई तकनीक खोजी है। एक ऐसा एडसोर्बेंट (शोषक पदार्थ) तैयार किया है जो कि वस्त्र, प्रिंटिंग और औषधि उद्योगों से निकल रहे रासायनिक रंगों वाले पानी की गंदगी को पूरी तरह से साफ कर सकता है।

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यह तकनीक रासायनिक पानी में मिले एजो डाई, कॉन्गो-रेड और मिथाइल-ऑरेंज जैसे खतरनाक प्रदूषकों को 85 से 99 फीसदी तक हटाने में सक्षम है। एडसोर्बेंट प्रति ग्राम सामग्री से 869.5 मिलीग्राम तक रंग सोखने की क्षमता रखता है और इसकी अनुमानित लागत मात्र 9 पैसे प्रति लीटर आंकी गई है। 
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इस अनुसंधान को स्कूल ऑफ मैटेरियल साइंस एंड टेक्नोलॉजी के प्रो. चंदन उपाध्याय और अमित बार के साथ ही रसायन अभियांत्रिकी एवम प्रौद्योगिकी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर राम शरण सिंह किया है। इन्होंने बताया कि इस शोध में अच्छाई ये भी है कि वर्तमान में उपयोग होने वाले कई फिल्टरों को लगाने की जरूरत नहीं है।

रासायनिक स्पंज की तरह करता है काम
शोध टीम ने लेयर्ड डबल हाईड्रॉक्साइड्स (एलडीएच) आधारित एक उन्नत शोषक पदार्थ विकसित किया है। ये रासायनिक स्पंज की तरह काम करता है। इनका कहना है कि वस्त्र उद्योग से हर साल अरबों लीटर ऐसा अपशिष्ट जल निकलता है, जिसमें खतरनाक एजो डाई पाई जाती है। ये रसायन न केवल हटाने में कठिन होते हैं, बल्कि मानव स्वास्थ्य और जलीय जंतुओं के लिए भी गंभीर खतरा बनते हैं।

पहले की तकनीक हैं महंगी, ये वाली इको फ्रेंडली भी
प्रो. चंदन उपाध्याय ने बताया कि शोध टीम ने सस्ती और इको फ्रेंडली तकनीक तैयार की है। इस सामग्री के निर्माण के लिए एक सरल और व्यावहारिक विधि विकसित की है। जबकि पहले से प्रचलित तकनीक की तरह महंगे और विशेष उपकरण की आवश्यकता नहीं होती। सामान्य धातु नाइट्रेट्स और नियंत्रित ताप प्रक्रिया के उपयोग से यह तकनीक आर्थिक रूप से किफायती और पर्यावरण के अनुकूल बनती है।

वस्त्र उद्योग से निकलने वाले रासायनिक रंगों की सफाई न केवल वैश्विक वस्त्र उद्योग की समस्या है, बल्कि वाराणसी क्षेत्र के स्थानीय कालीन उद्योग से भी प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है। यह नवाचार एक प्रभावी औद्योगिक समाधान के रूप में विकसित होने की प्रबल क्षमता रखता है। इसी उद्देश्य से इस तकनीक को आगे विकसित करने के लिए शोध टीम को ‘चैलेंज ग्रांट’ के अंतर्गत वित्तीय सहायता दी गई है। - प्रो. अमित पात्रा, निदेशक, आईआईटी बीएचयू

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