UP: ट्रांसजेंडर अधिकार संशोधन बिल का विरोध, सलमा चौधरी बोलीं- हमारी पहचान हम तय करेंगे या सरकार; नाराजगी
Varanasi News: बनारस क्वीयर प्राइड की ओर से आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में वक्ताओं ने स्पष्ट कहा कि आत्म-पहचान उनका मौलिक अधिकार है और वे किसी भी कीमत पर इससे समझौता नहीं करेंगे।
विस्तार
Transgender Rights Amendment Bill 2026: वाराणसी में प्रस्तावित ट्रांसजेंडर अधिकार संशोधन बिल 2026 के विरोध में शुक्रवार को शहर के क्वीयर समुदाय ने आवाज बुलंद की। बनारस क्वीयर प्राइड की ओर से आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में ट्रांसजेंडर और जेंडर-डाइवर्स समुदाय के लोगों ने इस विधेयक को उनके संवैधानिक अधिकारों और आत्म-पहचान के खिलाफ बताया।
प्रेस वार्ता में वक्ताओं ने कहा कि संसद में प्रस्तावित यह संशोधन ट्रांसजेंडर समुदाय की गरिमा, स्वायत्तता और पहचान के अधिकार को कमजोर करता है। किन्नर समाज की सलमा चौधरी ने तीखा सवाल उठाते हुए कहा कि हमारी पहचान हम तय करेंगे या सरकार? ऐसा कोई कानून जो हमारी पहचान पर नियंत्रण करे, हमें स्वीकार नहीं है। उन्होंने मांग की कि सरकार इस बिल को तत्काल वापस ले।
क्वीयर अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस बिल के कई प्रावधानों पर गंभीर आपत्ति जताई। उनका कहना है कि यह विधेयक राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण बनाम भारत संघ जैसे ऐतिहासिक फैसले की भावना के खिलाफ है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जेंडर पहचान स्वयं तय करने का अधिकार दिया गया है। इसी सिद्धांत को नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ और सुप्रियो बनाम भारत संघ में भी दोहराया गया था।
लगाया आरोप
वक्ताओं ने आरोप लगाया कि प्रस्तावित कानून ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को मेडिकल बोर्ड और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के जरिए पहचान प्रमाणित करने के लिए बाध्य करता है, जो न केवल अपमानजनक है बल्कि आत्म-पहचान के अधिकार का उल्लंघन भी है। इसके साथ ही विधेयक में ट्रांस व्यक्तियों की परिभाषा को अस्पष्ट बताया गया, जिससे ट्रांस पुरुष, ट्रांस महिलाएं और नॉन-बाइनरी समुदाय के कई लोग अपनी पहचान से वंचित हो सकते हैं।
कार्यकर्ताओं ने यह भी कहा कि बिल में 'किसी को ट्रांसजेंडर बनने के लिए उकसाने' को अपराध माना गया है, जो समुदाय के पारंपरिक सहयोग तंत्र पर सीधा हमला है। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे वे लोग भी अपराधी बन सकते हैं, जो अपने परिवारों से अलग रहकर एक-दूसरे का सहारा बनते हैं।
भेदभाव का लगाया आरोप
स्वास्थ्य संबंधी प्रावधानों पर भी सवाल उठाए गए। वक्ताओं ने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार जेंडर पहचान व्यक्ति की आत्म-स्वीकृति पर आधारित होती है, लेकिन यह विधेयक इसे नजरअंदाज करता है और मेडिकल प्रक्रियाओं को अनिवार्य बनाने की दिशा में बढ़ता है। इससे आर्थिक रूप से कमजोर ट्रांस व्यक्तियों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच और कठिन हो सकती है।
इसके अलावा, बिल में ट्रांसजेंडर समुदाय के खिलाफ होने वाले अपराधों के लिए अपेक्षाकृत कम सजा का प्रावधान, आरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं की कमी, तथा शिक्षा और जागरूकता के अभाव को लेकर भी चिंता जताई गई। वक्ताओं का कहना था कि यह संशोधन सामाजिक वास्तविकताओं- जैसे परिवार से बहिष्कार, रोजगार और शिक्षा में भेदभाव... को नजरअंदाज करता है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस के अंत में ट्रांस महिला हेतवी और अन्य वक्ताओं ने एकजुटता की अपील करते हुए कहा कि यह संशोधन समानता और गरिमा की दिशा में हुई प्रगति को पीछे ले जाएगा। उन्होंने नागरिकों, सामाजिक संगठनों और क्वीयर समुदाय से इस विधेयक के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठाने का आह्वान किया।