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यात्राओं की नगरी काशी: प्रथमेश से जगत के पालनहार तक की यात्राएं, जन्म से मुक्ति तक की कामना करते हैं श्रद्धालु
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
Published by: Pragati Chand
Updated Wed, 03 Jun 2026 09:39 AM IST
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सार
Varanasi News: पंचक्रोशी, 56 विनायक, अष्टभैरव, नवदुर्गा, चार धाम से लेकर जगन्नाथ और कामाख्या की भी यात्राएं काशी में निकलती है। यात्राओं के दौरान श्रद्धालु जन्म से मुक्ति तक की कामना करते हैं।
पंचक्रोशी यात्रा
- फोटो : अमर उजाला आर्काइव
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विस्तार
काशी के कण-कण शंकर और बाबा के गण हैं। ऐसी काशी में जन्म-जनमांतर के पापों के नाश और जीवन मुक्ति के लिए यात्राएं भी निकाली जाती हैं। 50 से अधिक यात्राएं निकलती हैं, जो अलग-अलग तिथियों और हिंदू मास में होती हैं। 56 विनायक से लेकर जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित यात्राएं हैं। श्रद्धालु जन्म से मुक्ति तक की कामना करते हैं। सबसे बड़ी यात्रा पंचक्रोशी की है, जो पांच दिनों में करीब 84 किमी तक निकलती है।
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काशी में यात्रा को विशेष महत्व है। हर माह यात्राएं निकलती हैं। बड़ी शीतला माता मंदिर के महंत पं. शिव प्रसाद पांडेय लिंगिया महाराज ने कहा कि काशी में यात्रा करने से यहां मौजूद 33 कोटि देवताओं के फल मिलते हैं। श्रीकाशी विश्वनाथ उन्हें मुक्ति प्रदान करते हैं। मंगला गौरी मंदिर के महंत पं. नारायण गुरु ने बताया कि काशी में आने से पापों का शमन होता है और यहां यात्रा करने से काशी में किए गए शारीरिक, मानसिक और वचन से पाप कट जाते हैं। साथ ही पुण्यफल जागृत हो जाते हैं।
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श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के पूर्व अध्यक्ष प्रो. नागेंद्र पांडेय ने बताया कि काशी में सभी देवता मौजूद हैं। यहां यात्रा करने से सभी देवताओं की परिक्रमा हो जाती है तो इसका पुण्यफल मिलता है। काशी में रहना तभी सार्थक होगा, जब यात्राएं करते हैं। पंचक्रोशी यात्रा करने से पूरी काशी की परिक्रमा हो जाती है। इससे मठ, मंदिर और आश्रमों में मौजूद सभी देवताओं की पूजा करते हैं। इन यात्राओं से बाबा विश्वनाथ सहित सभी देवताओं के पुण्यफल और मुक्ति मिलती है।
शीतला और भैरव यात्रा से निरोग और अकालमृत्यु से मुक्ति
काशी में शीतला और भैरव यात्रा के अलग फल हैं। माता शीतला की यात्रा व दर्शन पूजन करने से श्रद्धालु पूरे परिवार के निरोग और मौसमी रोगों का शमन होता है। जबकि भैरव यात्रा और दर्शन से भक्तों को अकालमृत्यु से भी नहीं होती है। भक्त हमेशा सुख-समृद्धि के साथ निरोग रहते हैं।
पूजन और भोग होते हैं अलग
हर माह में यात्राएं निकाली जाती हैं। हर देवता और देवियों के अलग-अलग भोग और पुण्यफल भी हैं। भगवान विष्णु को समर्पित पुरुषोत्तम मास में यात्रा व दर्शन पूजन में मालपुआ, तुलसी दल विशेष चढ़ता है। इस मास में जलदान, सत्तू, गुड़, मखन, मलाई आदि चढ़ता है। माता शीतला को बसिऔरा पूजा में गुलगुला, पूड़ी, सब्जी आदि पकवानों के अलावा ऋतु फल आदि भोग लगता है।
शव यात्रा के पग पग का फल
काशी में अंतिम यात्रा शवयात्रा होती है। पं. शिव प्रसाद पांडेय लिंगिया महाराज ने बताया कि इस यात्रा के करने से जितने पग-पग चलते हैं उतने फल हैं। 10 कदम भी चले ते अनंत फल मिलता है। पौराणिक मान्यतानुसार इसी यात्रा के दौरान श्रीकाशी विश्वनाथ मणिकर्णिका घाट पर मृत व्यक्ति के कान में मुक्ति मंत्र देते हैं।
काशी में शीतला और भैरव यात्रा के अलग फल हैं। माता शीतला की यात्रा व दर्शन पूजन करने से श्रद्धालु पूरे परिवार के निरोग और मौसमी रोगों का शमन होता है। जबकि भैरव यात्रा और दर्शन से भक्तों को अकालमृत्यु से भी नहीं होती है। भक्त हमेशा सुख-समृद्धि के साथ निरोग रहते हैं।
पूजन और भोग होते हैं अलग
हर माह में यात्राएं निकाली जाती हैं। हर देवता और देवियों के अलग-अलग भोग और पुण्यफल भी हैं। भगवान विष्णु को समर्पित पुरुषोत्तम मास में यात्रा व दर्शन पूजन में मालपुआ, तुलसी दल विशेष चढ़ता है। इस मास में जलदान, सत्तू, गुड़, मखन, मलाई आदि चढ़ता है। माता शीतला को बसिऔरा पूजा में गुलगुला, पूड़ी, सब्जी आदि पकवानों के अलावा ऋतु फल आदि भोग लगता है।
शव यात्रा के पग पग का फल
काशी में अंतिम यात्रा शवयात्रा होती है। पं. शिव प्रसाद पांडेय लिंगिया महाराज ने बताया कि इस यात्रा के करने से जितने पग-पग चलते हैं उतने फल हैं। 10 कदम भी चले ते अनंत फल मिलता है। पौराणिक मान्यतानुसार इसी यात्रा के दौरान श्रीकाशी विश्वनाथ मणिकर्णिका घाट पर मृत व्यक्ति के कान में मुक्ति मंत्र देते हैं।
पढ़ें- पूरी लिस्ट
| यात्राएं | कब |
| पंचक्रोशी | मलमास, सावन, महाशिवरात्रि |
| अंतरगृही | फाल्गुन |
| पंच तीर्थी | ज्येष्ठ मास |
| 56 विनायक | गणेश चतुर्थी |
| अष्ट भैरव | भैरव अष्टमी |
| विश्वनाथ यात्रा | निर्जला एकादशी |
| चार धाम | वैशाख अक्षय तृतीय |
| जगन्नाथ और कामाख्या यात्रा | आषाढ़ शुक्ल पक्ष |
| बदरीनाथ | अक्षय तृतीया |
| दशाश्वमेधेश्वर | गंगा दशहरा |
| बैजनाथ धाम | सावन |
| केदारेश्वर अंतरगृही | वैशाख |
| द्वादश ज्योर्तिलिंग | सावन व महाशिवरात्रि |
| शीतला यात्रा चैत्र | चैत्र, वैशाख, जेष्ठ और आषाढ़ |
| अन्नपूर्णा यात्रा | कार्तिक धनतेरस |
| विशालाक्षी | हर माह की शुक्ल पक्ष की तृतीया |