Varanasi News: पुलिस कस्टडी में मौत के बाद कराई थी 100 रुपये की चोरी की प्राथमिकी, 29 साल बाद मिला न्याय
Varanasi News: वाराणसी जिले में 29 साल पहले पुलिस कस्टडी में राजेंद्र प्रसाद सिंह की मौत के बाद 100 रुपये की चोरी की प्राथमिकी दर्ज की गई थी। मामले में 29 साल बाद पत्नी को न्याय मिला। दो दरोगा और एक चिकित्सक दोषी पाए गए।
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29 साल पहले सुंदरपुर पुलिस चौकी में राजेंद्र प्रसाद सिंह की प्रताड़ना से मौत हुई थी लेकिन पुलिस ने 100 मिनट में ही इसे आत्महत्या बता दिया था। सीबीसीआईडी की जांच से पता चला कि राजेंद्र को अवैध रूप से पुलिस अभिरक्षा में रखा गया था। पुलिस ने राजेंद्र प्रसाद सिंह की मौत के बाद 100 रुपये की चोरी की प्राथमिकी दर्ज की थी।
जिस शिकायतकर्ता दयाराम की तहरीर के आधार पर प्राथमिकी दर्ज की गई थी, उसका मिर्जापुर का पता ही फर्जी मिला था। पुलिस ने वारदात के दिन शाम 5:15 बजे राजेंद्र को पुलिस अभिरक्षा में दिखाया और शाम 6:55 बजे ही आत्महत्या की कहानी बता दी। परिजनों को सूचना दिए बगैर ही अगले दिन तड़के 5: 30 बजे पोस्टमार्टम कराया और हरिश्चंद्र घाट पर अंतिम संस्कार करा दिया।
सोमवार को तत्कालीन दरोगा नरेंद्र प्रताप सिंह को 10 साल, विवेचक राधेश्याम सिंह को छह महीने और पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर केके जैन को पांच साल की सजा मिली थी। पुलिस ने मामले की फाइल भी बंद कर दी थी लेकिन राजेंद्र की पत्नी शशिमा सिंह ने 29 साल तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी और अदालत में प्रभावी पैरवी कराकर तत्कालीन दरोगा नरेंद्र प्रताप सिंह को दस साल, विवेचक राधेश्याम सिंह को छह महीने और पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर केके जैन को 5 साल सजा दिलवाई।
शशिमा ने मानवाधिकार आयोग, राज्यपाल और सीबीसीआईडी का दरवाजा खटखटाया तब जाकर न्याय मिला। शशिमा सिंह 11 फरवरी 1997 से ही न्याय पाने की लड़ाई लड़ती रहीं और अब दोषियों को सजा मिल सकी है।
जांच अधिकारी श्रीकांत पांडे ने बताया था कि सुंदरपुर पुलिस चौकी की प्रविष्टि संख्या 21 में राजेंद्र कुमार का पता, तलाशी या अन्य विवरण दर्ज नहीं किया गया था। दयाराम के पते की मिर्जापुर में जांच की गई थी। जांच अधिकारी ने दयाराम के अस्तित्व की जांच की और उसे पूरी तरह काल्पनिक एवं फर्जी पाया। चुनार के प्रधानों से जानकारी ली गई।
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जिस अपराध में राजेंद्र प्रसाद सिंह को सुंदरपुर पुलिस चौकी में रखा गया था वह सीबीसीआईडी की जांच में पूरी तरह से फर्जी निकला। पता चला कि वारदात के दिन राजेंद्र ने कैंट से बस पकड़ी थे। बस में कुछ लोगों के बीच विवाद हुआ था। इसी विवाद में पुलिस उन्हें थाने लेकर आई। जांच टीम ने पाया कि राजेंद्र को हिरासत में लेने वाले पुलिसकर्मी का नाम और गिरफ्तारी से संबंधित आवश्यक अभिलेख उपलब्ध नहीं हैं। यदि उन्हें विधिवत हिरासत में लिया गया था तो उन्हें थाना लंका थाने के हवालात में रखा जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं किया गया। समय में भी गड़बड़झाला किया गया था। जिस स्टूल पर खड़े होने और शॉल के सहारे फंदा लगाकर जान देने की कहानी पुलिस ने गढ़ी थी वो भी झूठी निकली। न तो शॉल मिली न ही लॉकअप में रखा स्टूल बरामद हो सका। सूर्योदय से पहले ही राजेंद्र प्रसाद सिंह का पोस्टमार्टम करा दिया गया। जब जांच टीम ने सवाल पूछा कि इतनी जल्द क्या थी पोस्टमार्टम की तो इसका भी संतोषजनक जवाब पुलिसकर्मी नहीं दे सके।
सामान्य डायरी में भी नहीं था राजेंद्र का ब्योरा
जांच अधिकारी श्रीकांत पांडे ने अपने बयान में बताया था कि सुंदरपुर पुलिस चौकी की सामान्य डायरी की दिनांक 5 फरवरी 1997 की प्रविष्टि संख्या 21 में राजेंद्र कुमार का पता, तलाशी या अन्य आवश्यक विवरण दर्ज नहीं किया गया था। प्राथमिकी में दर्ज कराने वाले दयाराम के पते की मिर्जापुर में जांच की गई थी। जांच अधिकारी ने दयाराम के अस्तित्व की जांच की और उसे पूरी तरह काल्पनिक एवं फर्जी पाया। जांच के दौरान मिर्जापुर जिले के चुनार क्षेत्र के ग्राम प्रधानों और ग्रामीणों से जानकारी ली गई। उनसे प्राप्त प्रमाणपत्रों के आधार पर यह पुष्टि हुई कि कथित दयाराम निवासी मरहट्ट का कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं था।
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जांच टीम ने मतदाता सूची का मिलान किया
जांच अधिकारी ने स्वीकार किया कि उनकी विस्तृत जांच रिपोर्ट और पूछताछ के दौरान दर्ज किए गए बयान न्यायालय की पत्रावली में उपलब्ध नहीं हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मतदाता सूची में दर्ज दयाराम और मुकदमा संख्या 12/1997 में वादी बनाए गए दयाराम अलग-अलग व्यक्ति थे। मतदाता सूची वाले दयाराम और अन्य लोगों ने भी इस बात की पुष्टि की थी ।पुलिस रिकॉर्ड और वास्तविक घटनाक्रम के बीच जांच टीम ने गंभीर विरोधाभास पाया।