UP: शंकराचार्य ने किया तंज, बोले- जो लोग धर्म को बांट रहे वे कालनेमि, राक्षसों जैसा काम कर रहे कुछ संत
Varanasi News: शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने मीडिया से बातचीत में कहा कि जो गाय, ब्राह्मण, देवताओं को नुकसान पहुंचाता है वह कालनेमि कहलाने योग्य है। यूजीसी के सवाल पर कहा कि इसके नए नियम को बताया तो सनातन के लिए खतरा हो जाएगा।
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UP News: शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने बृहस्पतिवार को केदार घाट स्थित श्रीविद्या मठ में मीडिया से बात की। उन्होंने कहा कि उन्हें कालनेमि कहा गया, लेकिन जब उन्होंने प्रमाण मांगा तो कोई सिद्ध नहीं कर सका। आज के समय में यह साफ दिख रहा है कि कालनेमि कौन है। जो लोग धर्म को बांट रहे हैं, उनका चोला साधु-संतों का है लेकिन काम राक्षसों जैसा है, जो गाय, ब्राह्मण और देवताओं को नुकसान पहुंचाता है।
शंकराचार्य ने कहा कि मौजूदा सरकार की भाषा न्यायिक नहीं रह गई है। जो सरकार बटुकों और बुजुर्गों पर लाठी चला सकती है, वह साधु-संतों की सरकार नहीं हो सकती। आज स्थिति यह है कि देश गोवंश के निर्यात में दूसरे स्थान पर खड़ा है। जो स्वयं को संत बताता है, वह यह सिद्ध करे कि उसका कौन सा कार्य वास्तव में साधु-संतों वाला है।
सियासी तंज भी किया
देश में शिक्षा और धार्मिक मुद्दों पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि यूजीसी के नए नियमों के माध्यम से समाज को जाति और धर्म के नाम पर बांटने की कोशिश की जा रही है। इससे ब्राह्मण समाज ही नहीं, बल्कि पूरी सनातन परंपरा खतरे में है।
उन्होंने मंदिरों और मूर्तियों को क्षति पहुंचाए जाने की घटनाओं पर भी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि इतिहास में यह काम औरंगजेब करता था लेकिन आज भी लगातार मंदिरों और पूजित मूर्तियों को तोड़ा जा रहा है। यदि कोई स्वयं को संत मानता है तो उसे मूर्तियों और मंदिरों से लगाव होना चाहिए।
उन्होंने सोशल मीडिया को लेकर भी चिंता जताई और कहा कि एआई वीडियो का हवाला देकर अब सोशल मीडिया को कलंकित किया जा रहा है। इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा असर पड़ रहा है और लोग खुलकर अपनी बात नहीं रख पा रहे हैं।
यूजीसी के नए नियम को बताया सनातन के लिए खतरा
शंकराचार्य ने यूजीसी के नए नियमों को सनातन धर्म के लिए खतरा बताते हुए कहा कि सरकार शिक्षा के माध्यम से धार्मिक और सामाजिक संरचना को कमजोर कर रही है। गृह मंत्री द्वारा यह कह दिया गया है कि संसद से पारित कानून सभी को मानना होगा और सुप्रीम कोर्ट उसमें केवल सुधार कर सकता है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब कानून के जरिये धर्म और परंपरा पर असर पड़ेगा तो संत समाज चुप कैसे रह सकता है।
