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UP: महामूर्ख सम्मेलन में दिखेगा अमेरिका-ईरान युद्ध और तेल संकट, 10 हजार से ज्यादा लोग होंगे शामिल

अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Pragati Chand Updated Tue, 31 Mar 2026 04:22 PM IST
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सार

Varanasi News: बेमेल शादी में अगड़म-बगड़म मंत्र के साथ निकाह भी पढ़ाया जाएगा। कवियों में दिल्ली के लाफ्टर चैलेंज के हास्य कलाकार सरदार प्रताप फौजदार गुदगुदाएंगे। 

US-Iran War and Oil Crisis will be featured at Gathering of Supreme Fools in varanasi
महामूर्ख सम्मेलन की जानकारी देते पदाधिकारी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

काशी का महामूर्ख मेला 58 साल का हो गया। इस बार इस सम्मेलन में अमेरिका-ईरान युद्ध के साथ तेल और सिलिंडर का संकट देखने को मिलेगा। गदहे की गर्दभ ध्वनि के साथ सम्मेलन का आगाज होगा। बेमेल शादी में अगड़म-बगड़म मंत्र के साथ निकाह भी पढ़ाया जाएगा। कवियों में दिल्ली के लाफ्टर चैलेंज के हास्य कलाकार सरदार प्रताप फौजदार गुदगुदाएंगे। विभिन्न प्रांतों के कवि भी जुटेंगे। 10 हजार से ज्यादा लोग इसमें शामिल होंगे। 

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शनिवार गोष्ठी की ओर से साहित्यकार स्व. धर्मशील चतुर्वेदी, स्व. चकाचक बनारसी की परंपरा को कायम रखते हुए महामूर्ख सम्मेलन आयोजित होगा। संस्था के अध्यक्ष श्यामलाल यादव, उपाध्यक्ष डॉ. रमेशदत्त पांडेय, दमदार बनारसी व दिलीप सिंह ने सोमवार को लक्सा स्थित मारवाड़ी भवन में पत्रकारों को बताया कि इस बार महामूर्ख सम्मेलन की थीम विश्वयुद्ध और साइबर अपराध होगा। अमेरिका-ईरान युद्ध प्रमुखता से दिखेगा। 
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शाम को सात बजे से शुरू हो रहे महामूर्ख सम्मेलन प्रमुख कवियों में सरदार प्रताप फौजदार, अकबर ताज खंडवा, कामता माखन रीवा, धर्मराज उपाध्याय लखनऊ, विकास बौखल बाराबंकी, जगजीवन मिश्रा मिर्जापुर, वाराणसी के सलीम शिवालवी, प्रशांत बजरंगी और प्रशांत सिंह होंगे। उन्होंने बताया कि बेमेल शादी में बंगाली मौर पहनाया जाएगा। बनारसी नगाड़े पर नृत्य के अलावा छह लड़कियां मोहिनी नृत्य करेंगी। 

चौक थाने में भी हुआ था महामूर्ख सम्मेलन 

चौक थाने के सामने भद्दोमल के छत से महामूर्ख सम्मेलन की शुरुआत हुई थी। तब धर्मशील चतुर्वेदी, भइयाजी बनारसी, चकाचक बनारसी, सांड बनारसी आदि कवियों ने इसका आगाज किया था। दमदार बनारसी ने बताया कि इसके बाद चौक थाने के बाद गंगा पार में भी इसका आयोजन हो चुका है। जब से डॉ. राजेंद्र प्रसाद घाट बना तक से वहीं पर आयोजन हो रहा है। 

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अप्रैल फूल डे का था जवाब 
अंग्रेज भारत में अपने नववर्ष को ऊंच और हिंदू नववर्ष को नीचे दिखाने के लिए एक अप्रैल को अप्रैल फूल डे कहा करते थे। डॉ. रमेशदत्त पांडेय ने बताया कि तब काशी के विद्वानों और साहित्यकारों ने इसका विरोध हास्य-व्यंग्य से करने का निर्णय लिया था। इसके बाद उन्होंने महामूर्ख सम्मेलन की परंपरा शुरू की। इस मंच को संगठित कर साहित्य, हास्य, कला, जनजागरण का अद्वितीय मंच बनाया। 
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