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धूल फांक रहीं फाइलें: वाराणसी में 14 हजार मामलों में गवाहों का इंतजार, 13 हजार के दस्तावेज नहीं

रवि प्रकाश सिंह, संवाद न्यूज एजेंसी, वाराणसी। Published by: Pragati Chand Updated Thu, 25 Jun 2026 05:13 PM IST
सार

Varanasi News: वाराणसी की अदालत में रोज 100-150 के बीच दीवानी और फौजदारी के मामले दाखिल होते हैं। यहां 14 हजार मामलों में गवाहों का इंतजार है तो 13 हजार के दस्तावेज ही नहीं हैं।

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Varanasi witnesses awaited in 14,000 cases documents missing for 13,000
court - फोटो : adobestock

विस्तार

वाराणसी जिले में न्याय की आस लगाए बैठे 1.78 लाख फरियादियों की फाइलें दशकों से धूल फांक रही हैं। 14282 मामलों में गवाही का इंतजार है जबकि 13 हजार मामलों में कोर्ट में मुकदमे से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध नहीं हो पाए। 639 मामले ऐसे हैं जिसमें मुकदमा दाखिल हो गया, लेकिन वादी के निधन के बाद उत्तराधिकारी सामने नहीं आए। 
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वाराणसी की अदालत में रोज 100-150 के बीच दीवानी और फौजदारी के मामले दाखिल होते हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि यहां तीन मामले ऐसे भी हैं, जो 56 साल (1970) से इंसाफ के तराजू पर तौले जा रहे हैं, लेकिन फैसला आज तक नहीं हो सका। जबकि 39 फीसदी मामलों का निस्तारण लंबित है। यानी 1.78 लाख मामले कोर्ट में चल रहे हैं। दीवानी और फौजदारी दोनों के मामले हैं। 
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तीन मामले ऐसे हैं जो 56 साल पुराने हैं बाकी 1976 से अब तक के मामले हैं। जिनमें न्याय का इंतजार फरियादियों को है। चौंकाने वाली बात ये है कि लंबित में 13593 मामले ऐसे हैं जिसमें अभियुक्तों की गिरफ्तारी का इंतजार है। कोर्ट की कमी की वजह से भी मामलों के निस्तारण में देरी हो रही है। 
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वर्तमान में फरियादियों के मुकदमों की सुनवाई 44 अदालतें कर रही हैं। जरूरत 76 कोर्ट की है। ऐसे में 32 कोर्ट की कमी है। क्षमता बढ़ाने के लिए हाल ही में सेंट्रल बार एसोसिएशन से हाईकोर्ट को पत्र लिखकर अवगत कराया था। बार काउंसिल को भी बताया गया। 

तीन ऐसे मामले हैं जो 50 साल से ऊपर के हैं और अभी भी सुनवाई जारी है। गवाहों, दस्तावेज और यहां तक कि रिकॉर्ड के अभाव के कारण अटके हैं। यह स्थिति अदालतों पर भारी बोझ डाल रही है। नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड से आंकड़े न्याय प्रणाली के सामने खड़ी चुनौतियों को स्पष्ट करते हैं।

दशकों पुराने मामले और न्याय की धीमी गति
वाराणसी की अदालतों में तीन ऐसे मामले भी हैं जो साल 1970 से चल रहे हैं। इन मामलों की सुनवाई 56 साल से जारी है, जो न्याय में अत्यधिक देरी का एक गंभीर उदाहरण है। कई बड़े मामलों में काउंसिल की लापरवाही भी सुनवाई में विलंब का एक प्रमुख कारण बनी है। यह स्थिति उन फरियादियों के लिए निराशाजनक है जो दशकों से न्याय की आस में बैठे हैं। ऐसे पुराने मामलों का लंबित रहना अदालतों पर अतिरिक्त दबाव डालता है। 639 मामलों में विधिक उत्तराधिकारी ही नहीं, 63 मामलों में रिकॉर्ड ही नहीं लंबित मामलों में 639 ऐसे मामले हैं जिसमें दीवानी मुकदमे के दौरान वादी का निधन हो गया। पत्नी, पुत्र, पुत्री या अन्य को वैध उत्तराधिकारी के रूप में शामिल किया जाता है। 639 मामले ऐसे हैं जिसमें विधिक उत्तराधिकारी सामने नहीं आए। इस वजह से ये मामले लंबित पड़े हैं। 63 ऐसे मामले हैं जिसमें अदालत में रिकॉर्ड ही नहीं। 214 मामलों में हाईकोर्ट से स्टे है।

मामलों के निस्तारण के लिए अभी 32 कोर्ट की कमी है। वर्तमान में 44 कोर्ट हैं। इस बाबत हाईकोर्ट को पत्रक सौंपा गया है। बार काउंसिल को भी अवगत कराया गया है। कोर्ट की संख्या बढ़ेगी तभी तेज से निस्तारण होगा। -प्रेम प्रकाश गौतम, अध्यक्ष सेंट्रल बार एसोसिएशन

अंग्रेजों के समय से चली आ रही व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं हुआ। पहले आदेश तुरंत आते थे जबकि अब आदेश आने लिए भी कोर्ट डेट दे देता है। साथ ही मैन पावर की कमी भी है। कोर्ट नियमित संचालित नहीं हो रहा, अवकाश की वजह से भी मामले प्रभावित होते हैं। -श्रीनाथ त्रिपाठी, सदस्य बार काउंसिल ऑफ इंडिया  

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