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राइस उद्योग पर शिपिंग संकट की मार, 400 डॉलर का भाड़ा पहुंचा 5,000 डॉलर
देशभर के राइस मिलर्स भारी आर्थिक संकट का सामना बंदरगाहों पर अटका करोड़ों का चावल, निर्यातकों पर आर्थिक संकट! शिपिंग खर्च 400 डॉलर से बढ़कर 5,000 डॉलर तक पहुंचा। माल पहुंचने का समय 15 दिन से बढ़कर ढाई-तीन महीने। यू ही लंबा चला तो आने वाली चावल के दामों में गिरावट की आशंका
इज़राइल-ईरान के बीच जारी तनाव और वैश्विक अनिश्चितता ने देश के बासमती चावल निर्यात कारोबार को बड़ा झटका दिया है। देशभर के राइस मिलर्स भारी आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। बंदरगाहों पर कंटेनर फंसे हैं, शिपिंग लागत कई गुना बढ़ चुकी है और भुगतान चक्र बुरी तरह प्रभावित हो गया है। भारत अपने बासमती चावल उत्पादन का लगभग 75 प्रतिशत निर्यात करता है, लेकिन मौजूदा युद्ध जैसी परिस्थितियों ने इस कारोबार की रफ्तार रोक दी है। देश के प्रमुख राइस मिल निर्यात पर निर्भर हैं।
राईस मिल मालिक आशीर जैन ने बताया कि पहले ईरान के लिए जाने वाला चावल सामान्य समुद्री मार्ग से करीब 15 दिन में पहुंच जाता था, लेकिन अब समुद्री मार्ग प्रभावित होने के कारण माल को दुबई के खोर फक्कान पोर्ट के जरिए भेजना पड़ रहा है। इससे पहले जहां एक कंटेनर का शिपिंग खर्च करीब 400 डॉलर था, वहीं अब यह बढ़कर 5,000 डॉलर या उससे अधिक हो गया है। साथ ही माल को गंतव्य तक पहुंचने में ढाई से तीन महीने तक लग रहे हैं।
उन्होंने कहा कि युद्ध के कारण कई जहाजों की सेवाएं रद्द होने से बड़ी संख्या में कंटेनर बंदरगाहों पर ही अटक गए हैं। एक महीने से अधिक समय तक कंटेनर बंदरगाह पर रहने पर निर्यातकों को भारी पोर्ट स्टोरेज चार्ज भी देना पड़ रहा है, जिससे करोड़ों रुपये का अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है। इस स्थिति के चलते कई निर्यातक तैयार माल को अब घरेलू बाजार में बेचने की कोशिश कर रहे हैं। यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो आने वाले दिनों में घरेलू बाजार में बासमती चावल की कीमतों में गिरावट देखने को मिल सकती है।
हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय बासमती चावल की मांग अभी भी मजबूत बनी हुई है। कई देशों में चावल की कमी होने के कारण खरीदार बढ़ी हुई शिपिंग लागत और लंबी ट्रांजिट अवधि के बावजूद भारतीय चावल खरीदने को तैयार हैं। लेकिन परिवहन बाधाओं ने पूरे निर्यात कारोबार को गंभीर संकट में डाल दिया है।
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