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मेरा गांव मेरी शान: काछवा गांव आस्था, इतिहास और भाईचारे की अनूठी पहचान, यहां रहती हैं 36 बिरादरी
शहर से करीब 13 किलोमीटर दूर स्थित काछवा गांव आज भी अपनी समृद्ध विरासत, धार्मिक सौहार्द और सामाजिक एकता के लिए अलग पहचान बनाए हुए है। देवगुरु बृहस्पति के पुत्र ऋषि कच्छ की तपोस्थली के रूप में प्रसिद्ध यह गांव न केवल ऐतिहासिक महत्व रखता है, बल्कि 36 बिरादरी के भाईचारे की मिसाल भी पेश करता है।
ग्रामीणों के अनुसार, गांव का नाम काछवा यहां प्राचीन समय में तालाबों में कछुओं की अधिकता के कारण पड़ा। वहीं इतिहासकार इस क्षेत्र का संबंध कछवाहा राजपूत वंश से जोड़ते हैं, जिन्होंने 11वीं शताब्दी में राजपुताना समेत कई क्षेत्रों में अपनी सत्ता स्थापित की थी। गांव की सबसे बड़ी खासियत इसकी धार्मिक एकता है। यहां श्रीकृष्ण मंदिर और पीर बाबा शहजमाल की मजार तक जाने का एक ही रास्ता है। करीब 30 हजार की आबादी वाले इस गांव में जैन समाज का भी ऐतिहासिक स्थान रहा है। ग्रामीणों के अनुसार, वर्ष 1930 में जैन समाज के स्थानक का निर्माण शुरू हुआ और 1937 में यह स्थापित हुआ। जैन समाज के प्रबुद्ध व्यक्तियों के अनुसार, वर्ष 1962 में यहां भव्य चातुर्मास का आयोजन हुआ था, जिसमें जैन संत चार महीने तक गांव में ठहरे थे। हालांकि वर्तमान में जैन समाज के अधिकांश लोग यहां से पलायन कर चुके हैं, लेकिन उनकी आस्था आज भी गांव से जुड़ी हुई है। हर वर्ष वह पीर बाबा शहजमाल की मजार पर माथा टेकने पहुंचते हैं और अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं।
इसके अलावा गांव में गुरुद्वारा सिंह सभा, दो अन्य गुरुद्वारे, दो रविदास मंदिर, एक वाल्मीकि मंदिर, एक शनिदेव मंदिर, एक शिव मंदिर और गोगामेड़ी भी स्थित है। करीब 40 वर्ष पहले निर्मित गुरुद्वारा सिंह सभा सिख संगतों की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। काछवा गांव आज भी अपनी कृषि प्रधान संस्कृति, ऐतिहासिक विरासत और सामाजिक समरसता के कारण क्षेत्र में एक आदर्श गांव के रूप में जाना जाता है, जहां विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग मिलजुल कर रहने की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
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