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मेरा गांव मेरी शान: गढ़ी उजाले खां गांव का 300 साल पुराना इतिहास, भाईचारे और विकास की मिसाल
करीब 300 साल पुराने गांव गढ़ी उजाले खां ने समय के साथ विकास की नई पहचान बनाई है। आजादी से पहले यहां के अधिकांश भू-मालिक मुस्लिम समुदाय से थे और उनके पास करीब 900 बीघा भूमि थी। देश विभाजन के बाद मुस्लिम परिवार पाकिस्तान चले गए और यह भूमि पाकिस्तान से आए परिवारों को आवंटित की गई।
ग्रामीणों के अनुसार, पहले गांव में मुख्य रूप से सैनी, कश्यप और हरिजन समाज के लोग रहते थे। बाद में बराह कलां, हुल्लाहेड़ी, नारायणा (पानीपत), कोहला और गोहाना सहित आसपास के क्षेत्रों से लोग यहां आकर बस गए। वर्तमान में गांव में करीब 16 जातियों के लोग आपसी भाईचारे और सौहार्द के साथ रह रहे हैं। गांव में आज भी दो मुस्लिम परिवार निवास करते हैं। गांव का पुराना तालाब आज भी "मियां वाला तालाब" के नाम से जाना जाता है, जो आजादी से पहले की मुस्लिम बसासत की याद दिलाता है।
गांव की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार खेती, दुकानदारी और नौकरी है। लगभग 50 प्रतिशत लोग व्यापार से जुड़े हैं, जबकि शेष लोग खेती और नौकरी के माध्यम से आजीविका चला रहे हैं। गांव के अनेक युवाओं ने सेना में भर्ती होकर देश सेवा की है। गांव के एक सैनिक को स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा भी प्राप्त हुआ था। 1962 और 1965 के युद्धों में भी यहां के सैनिकों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया था।
शिक्षा के क्षेत्र में भी गांव लगातार आगे बढ़ रहा है। यहां स्थित राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय का चयन पीएम श्री विद्यालय के रूप में हुआ है। विद्यालय में करीब 1200 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। इसी स्कूल से शिक्षा प्राप्त कर अनेक युवा डॉक्टर, वकील, अध्यापक और पुलिस विभाग में सेवाएं दे रहे हैं।
खेलों में गांव की पहचान लंबे समय से कुश्ती के लिए रही है। पुराने समय में यहां कई नामी पहलवान हुए। ग्रामीणों के अनुसार, गांव के एक पहलवान को अपनी कुश्ती कला के दम पर 100 बीघा जमीन इनाम में मिली थी। वर्तमान में गांव में सरपंच, 16 पंच और ब्लॉक समिति सदस्य जनसेवा में सक्रिय हैं।
ग्रामीण बताते हैं कि पहले गांव चारों ओर आम और जामुन के बागों से घिरा रहता था, लेकिन बढ़ती आबादी और विस्तार के कारण अब वे बाग लगभग समाप्त हो चुके हैं। सिंचाई के लिए किसान नहर और ट्यूबवेल का उपयोग करते हैं, जबकि पेयजल की आपूर्ति नहरी पानी से होती है।
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