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Mandi Chanting of mantras, performing of Havan rituals, and prayers on the banks of the sacred Rewalsar Lake for attaining salvation
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Mandi: मोक्ष प्राप्ति के लिए पवित्र रिवालसर झील के तट पर मंत्र जाप, हवन पाठ और प्रार्थनाएं
तीन धर्मों की संगम स्थली के नाम से विख्यात रिवालसर शहर में इन दिनों बौद्ध अनुयायियों का तांता लगा हुआ है। यह बौद्ध अनुयायी यहां पवित्र झील के तट पर बैठकर मंत्र जाप, हवन पाठ और प्रार्थनाएं कर रहे हैं। किन्नौर, लाहौल-स्पीति और लेह-लद्दाख से बड़ी संख्या में जबकि नॉर्थ ईस्ट और देश दुनिया के अन्य स्थानों से भी बौद्ध अनुयायी रिवालसर आकर यहां पवित्र झील के किनारे बैठकर मंत्र जाप कर रहे हैं। यह सिलसिला छेश्चू मेले तक जारी रहेगा। बौद्ध धर्म में रिवालसर को एक पवित्र और धार्मिक तीर्थ माना जाता है। यहां बौद्ध धर्म गुरू पदमसंभव यानी रिनपोछे ने वर्षों तक तपस्या की थी। इस स्थान को उनकी तपोस्थली भी कहा जाता है। रिवालसर में ही गुरू पदमसंभव की विशालकाय मूर्ति भी स्थापित की गई है। लेह-लद्दाख के झांस्कर से आए नोडबू टशी ने बताया कि वे यहां बौद्ध धर्म की शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने आए हैं। यह उनके लिए एक धार्मिक स्थान है और यहां झील के किनारे पर बैठ कर मंत्र जाप करने से मौजूदा और अगले जीवन में सुख की प्राप्ति होती है। यहां तक की मोक्ष का रास्ता भी इसी मंत्र जाप और प्रार्थना से मिलता है। किन्नौर जिले से आई 75 वर्षीय ओपाल जंगमो ने बताया कि वे रिवालसर में इस पवित्र जाप के लिए तब से आ रही हैं जब वे मात्र 19 वर्ष की थी। रिवालसर झील के किनारे पवित्र मंत्र जाप करने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी या अगला जीवन खुशहाली भरा मिलेगा। इससे उनके पाप भी कटेंगे। उन्होंने बताया कि हवन पाठ बुरी शक्तियों को भगाने और क्षेत्र में सुख शांति कायम रखने के उद्देश्य से किया जाता है। हर वर्ष इस दौरान रिवालसर आना भगवान के और करीब आने जैसा ही है। छेश्चू मेले के बाद सभी वापिस अपने घरों की तरफ लौट जाएंगे। रिवालसर को त्रिवेणी के नाम से भी पुकारा जाता है क्योंकि यहां हिंदू, सिक्ख और बौद्ध धर्म के लोग बड़ी संख्या में आपसी भाईचारे और मेलजोल के साथ रहते हैं। यहां हिंदुओं के लोमश ऋषि, सिक्खों के गुरू गोबिंद सिंह और बौद्ध धर्म के गुरू पदमसंभव ने तपस्या की है। यही कारण है कि रिवालसर में वर्ष भर तीनों धर्मों के विभिन्न आयोजनों का दौर चला रहता है।
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