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Mandi News: एक लाख का पट्टू, 30 हजार का मफलर... हथकरघा की बेमिसाल कारीगरी ने खींचे कदम
Ankesh Dogra
Updated Wed, 12 Aug 2026 11:54 AM IST
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राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के मौके पर मंडी शहर के सेरी मंच पर लगाई गई हथकरघा प्रदर्शनी में किन्नौरी कला से तैयार महंगे और आकर्षक उत्पाद लोगों के बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं। प्रदर्शनी में एक लाख रुपये कीमत का किन्नौरी शॉलनुमा पट्टू और 30 हजार रुपये का मफलर विशेष आकर्षण का केंद्र है। इन दोनों उत्पादों को सोलन जिले के अर्की निवासी बुनकर नरेश कुमार ने तैयार किया है।
नरेश कुमार के अनुसार एक लाख रुपये कीमत वाला शॉलनुमा पट्टू उत्तम गुणवत्ता की ऊन, अंगोरा और पश्मीना से तैयार किया गया है। इसकी खासियत इसकी बारीक बुनाई के साथ इसमें उकेरी गई पारंपरिक किन्नौरी कला है। पट्टू पर महाभारत काल से प्रेरित प्राचीन चित्रकारी को भी उकेरा गया है, जिससे इसका कलात्मक और सांस्कृतिक महत्व और बढ़ जाता है।
नरेश कुमार ने बताया कि किसी भी शॉल या मफलर की कीमत केवल उसमें इस्तेमाल होने वाले कपड़े से तय नहीं होती। उसकी कीमत डिजाइन की जटिलता, सामग्री की गुणवत्ता और उसे तैयार करने में लगने वाले समय और मेहनत पर भी निर्भर करती है।
बारीक और जटिल डिजाइन तैयार करने में सामान्य उत्पादों की तुलना में कई गुना अधिक समय लगता है। वहीं, ऊन, अंगोरा और पश्मीना जैसी उच्च गुणवत्ता वाली सामग्री इस्तेमाल होने पर उत्पाद की लागत भी बढ़ जाती है।
शॉलनुमा पट्टू किन्नौर और कुल्लू की पारंपरिक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां सदियों से लोग इसे विशेष अवसरों पर पहनते आ रहे हैं। शादी-विवाह, देव उत्सव, त्योहार और अन्य धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजनों में पट्टू का विशेष महत्व रहता है।
प्रदर्शनी में पहुंचे लोगों ने पारंपरिक बुनाई और किन्नौरी डिजाइनों से तैयार उत्पादों को काफी पसंद किया। महंगे उत्पादों की बारीकी और उनमें दिखाई गई पारंपरिक कला लोगों के आकर्षण का प्रमुख कारण रही।
सोलन के अर्की निवासी नरेश कुमार वर्ष 1990 से हथकरघा के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। उन्होंने किन्नौर में इस पारंपरिक कला का प्रशिक्षण लिया था। करीब तीन दशक से अधिक समय से वह हथकरघा के क्षेत्र में सक्रिय हैं।
नरेश कुमार अब तक 500 से अधिक लोगों को हथकरघा की बुनाई का प्रशिक्षण दे चुके हैं। वर्तमान में 30 से अधिक लोग उनके साथ रोजगार से जुड़े हुए हैं।
उनके तैयार किए गए हथकरघा उत्पाद हिमाचल प्रदेश के अलावा देश के कई हिस्सों तक पहुंचे हैं। विदेशों में भी उनके उत्पादों की मांग और पहुंच रही है। नरेश कुमार के अनुसार केंद्र और प्रदेश सरकार की ओर से आयोजित विभिन्न प्रदर्शनियों में उत्पाद प्रदर्शित करने का अवसर मिलने से पारंपरिक हथकरघा को बाजार उपलब्ध हो रहा है। इससे बुनकरों को अपनी कला के साथ बेहतर आजीविका का अवसर भी मिल रहा है।
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