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Sirmour: 'या हुसैन' के नारों से गूंजा नाहन, सुन्नी समुदाय ने निभाई शियाओं की परंपरा
Ankesh Dogra
Updated Fri, 26 Jun 2026 04:05 PM IST
सांप्रदायिक सौहार्द के लिए मशहूर नाहन शहर में शुक्रवार को मुहर्रम मनाई गई। शहर के चारों मुख्य मोहल्लों से चार ताजियां देर शाम जुलूस की शक्ल में जामा मस्जिद कच्चा टैंक पहुंचे।
इस दौरान सुन्नी समुदाय के लोगों का जोश देखते ही बनता था। इस दौरान शोज, सलाम, हदीसे व मर्शिया पढ़ते व मातम मनाते युवकों ने मुहर्रम को पारंपरिक तरीके से मनाया। देर शाम मस्जिद के निकट करबला में इन ताजियों को वापस विदाई दी गई। जूलूस के दौरान जगह-जगह पेयपदार्थो के स्टॉल भी लगाए गए थे।
भले ही नाहन में शिया लोग नहीं रहते, लेकिन शहर के सुन्नी मुस्लिम आपसी भाईचारे, सांप्रदायिक सद्भावना की एक मिसाल पेश करते हुए एकजुटता से इस त्योहार को निरंतर मनाकर शियाओं की परंपरा को जिंदा रखे हैं।
शहर के चार मोहल्लों गुन्नूघाट, हरिपुर, रानीताल और कच्चा टैंक में सुन्नी समुदाय के लोग मुहर्रम पर आकर्षक व सुंदर ताजिए लेकर सूर्य अस्त होने से पूर्व जामा मस्जिद कच्चा टैंक एकत्रित हुए। इस मौके पर समुदाय के युवाओं ने इमाम हुसैन की याद में मातम मनाते हुए कई करतब दिखाए। कई युवाओं व बच्चों ने अपनी छातियां पीटीं।
ऐसे शुरू हुआ मुहर्रम मनाने का प्रचलन
सुन्नी मुस्लिमों द्वारा मुहर्रम मनाने की परंपरा 18वीं शताब्दी में महाराजा शमशेर प्रकाश के समय में शुरू हुई। उस समय यहां कुछ शिया परिवार रहते थे। अब यहां एक भी परिवार शियाओं का नहीं है।
महाराजा शमशेर प्रकाश के समय में इस बारे एक फरमान जारी हुआ था कि सभी धर्मों के लोग इस समारोह में शामिल होंगे। आज भी सुन्नी मुस्लिम रियासतकाल की इस परंपरा का लगातार निर्वहन कर रहे हैं। मुहर्रम पर शिया समुदाय के लोग इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हैं।
क्या है मुहर्रम
मुस्लिम सोसायटी नाहन के अध्यक्ष कैप्टन सलीम अहमद व प्रदेश उपाध्यक्ष अधिवक्ता शकील अहमद शेख ने बताया कि मुहर्रम कोई त्योहार नहीं, बल्कि इस्लामिक कैलेंडर हिजरी साल के पहले महीने का नाम है। इस महीने से इस्लामिक साल शुरू होता है। यह शोक का महीना है। इस महीने की 10 तारीख को रोज-ए-आशुरा भी कहा जाता है। इसी दिन को अंग्रेजी कैलेंडर में मुहर्रम कहा गया है।
मुहर्रम के महीने में इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद साहब के छोटे नवासे इमाम हुसैन और उनके परिवार समेत 72 अनुयायियों का कत्ल कर दिया गया था। हजरत हुसैन इराक के शहर करबला में यजीद की फौज से लड़ते हुए शहीद हुए थे। इस्लाम में सिर्फ एक ही खुदा की इबादत करने के लिए कहा गया है।
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