मंडला जिले में एक बैगा आदिवासी मजदूर परिवार को बिजली विभाग ने 11 लाख रुपये से ज्यादा का बिजली बिल भेज दिया। हालांकि, बाद में विभाग ने इसे तकनीकी त्रुटि बताया, लेकिन सवाल यह है कि इस गलती से परिवार को हुए मानसिक तनाव की जिम्मेदारी कौन लेगा?
ग्राम पंचायत झिरिया के ग्राम डूंडा निवासी रत्तेसिंह कन्हरिया एक बैगा आदिवासी मजदूर हैं। उनका परिवार प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने घर में रहता है और हर महीने उनका बिजली बिल सामान्यतः 100 से 200 रुपये के बीच आता है। करीब चार महीने पहले उनके घर का बिजली मीटर खराब हो गया। रत्तेसिंह ने टोल-फ्री नंबर 1912 पर शिकायत दर्ज कराई, लेकिन न तो मीटर बदला गया और न ही समस्या का समाधान हुआ। इसी दौरान विभाग ने उनके खिलाफ बिजली चोरी का मामला दर्ज कर लिया।
परिवार उस समय सदमे में आ गया, जब रत्तेसिंह के मोबाइल पर 11 लाख 44 हजार 680 रुपये का बिजली बिल पहुंचा। दो वक्त की रोटी के लिए मजदूरी करने वाले इस परिवार के लिए यह रकम किसी पहाड़ से कम नहीं थी। लाखों का बिल देखकर पूरा परिवार भय और चिंता में डूब गया।
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मामला सामने आने के बाद बिजली विभाग हरकत में आया। मंडला विद्युत वितरण कंपनी के कार्यपालन अभियंता अजीत चौहान ने जांच कर इसे तकनीकी त्रुटि माना। विभाग के अनुसार बिजली चोरी के प्रकरण में पेनाल्टी सहित वास्तविक देय राशि 10 हजार 814 रुपये है और बिल में सुधार कर दिया गया है।
हालांकि, विभाग ने अपनी गलती सुधार ली, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर एक गरीब आदिवासी परिवार को लाखों रुपये का बिल कैसे जारी हो गया? क्या केवल तकनीकी त्रुटि कह देने से जिम्मेदारी खत्म हो जाती है? यह मामला सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही और आम नागरिकों के प्रति संवेदनशीलता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।