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Shahdol News: करंट में गंवाए दोनों हाथ फिर भी नहीं हारी हिम्मत, ऑटो चालक दिव्यांगों के लिए बना प्रेरणास्रोत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शहडोल Published by: शहडोल ब्यूरो Updated Tue, 11 Mar 2025 12:56 AM IST
कहते हैं कि अगर हौसले बुलंद हों और दिल में कुछ करने का जुनून हो, तो कोई भी बाधा रुकावट नहीं बन सकती। ऐसा ही एक उदाहरण हैं शहडोल के चाका गाँव, ग्राम पंचायत खोलखमरा के निवासी हीरालाल महरा। मात्र सात वर्ष की उम्र में करंट लगने से उन्होंने अपने दोनों हाथ खो दिए, लेकिन इस बड़े हादसे के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी।
समय के साथ हीरालाल ने अपनी जिंदगी की नई राह खुद बनाई। कोहनियों तक कटे हाथों के बावजूद उन्होंने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया। अपनी मेहनत के बलबूते एक ऑटो खरीदा और पिछले 15 वर्षों से खुद ही चला रहे हैं।
40-50 किमी रोजाना चलाते हैं ऑटो
हीरालाल प्रतिदिन अपने गाँव से शहडोल की गंज मंडी तक ऑटो चलाते हैं और फिर वहाँ से ग्राम मालाचुआ तक सवारियाँ लाते-ले जाते हैं। हर दिन 40-50 किलोमीटर ऑटो चलाकर वे अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं। वे न तो किसी से कोई शिकायत रखते हैं और न ही ईश्वर से। उनका कहना है, "शायद मेरे भाग्य में हाथ नहीं थे, इसलिए ईश्वर ने उन्हें एक हादसे के जरिए वापस ले लिया।"
विकलांगता नहीं बनी जीविकोपार्जन और विवाह में बाधा
55 वर्षीय हीरालाल महरा बताते हैं कि जब शहडोल जिला चिकित्सालय में उनके दोनों हाथ कोहनियों से काटकर अलग कर दिए गए, तो परिवार शोक में डूब गया था। परिजनों को उनकी भविष्य की चिंता सताने लगी, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और परिवार के सहयोग से आगे बढ़ते गए।
वर्ष 1998 में उनका विवाह उमरिया जिले में हुआ। शुरुआत में उन्हें थोड़ी असहजता महसूस हुई, लेकिन उन्होंने आत्मविश्वास बनाए रखा। आज वे तीन पुत्रों और दो पुत्रियों के पिता हैं, जिनमें से तीन बच्चों का विवाह भी कर चुके हैं।
शादी के पहले वे परिवार के साथ खेती-बाड़ी में मदद करते थे, लेकिन 15 साल पहले उन्होंने खुद एक ऑटो खरीदा। चूँकि उनके हाथ नहीं थे, इसलिए उन्होंने ऑटो के एक्सीलेटर और गियर के लिए विशेष रूप से लोहे की रॉड लगवाई और फिर सड़कों पर ऑटो चलाने लगे। आज वे पूरी तरह आत्मनिर्भर हैं और अन्य सामान्य ऑटो चालकों की तरह सफर करते हैं। सवारियों को भी उन पर पूरा भरोसा है, और वे बिना किसी हिचकिचाहट के उनके ऑटो में बैठते हैं।
सरकारी सहायता नाममात्र, फिर भी आत्मनिर्भर
हीरालाल को सरकारी मदद के नाम पर मात्र 600 रुपये विकलांगता पेंशन मिलती है। इस वर्ष उन्होंने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवास के लिए आवेदन दिया है, लेकिन अब तक कोई स्वीकृति नहीं मिली है।
दिव्यांगों के लिए बने प्रेरणा स्रोत
हीरालाल उन सभी दिव्यांगों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं, जो अपनी शारीरिक अक्षमता को जीवन की बाधा मान लेते हैं और दूसरों पर निर्भर रहने की सोचते हैं। उन्होंने सभी दिव्यांगों से हिम्मत के साथ आगे बढ़ने की अपील की है और दिखा दिया कि सच्ची मेहनत और आत्मनिर्भरता से कोई भी मुश्किल पार की जा सकती है।
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