डिंडौरी जिले के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र समनापुर से जुड़ा एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां वर्षों तक ऐसा फर्जीवाड़ा चलता रहा, जिसकी भनक न तो विभागीय अधिकारियों को लगी और न ही जांच व निरीक्षण प्रणाली इसे रोक सकी।
मामला स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ कर्मचारी द्रोपती मरावी से जुड़ा हुआ है। जानकारी के अनुसार द्रोपती मरावी पिछले लगभग सात वर्षों से लकवाग्रस्त हैं और शारीरिक रूप से ड्यूटी करने में असमर्थ हैं। इसके बावजूद विभागीय अभिलेखों में उन्हें नियमित रूप से कार्यरत दर्शाया जाता रहा।
वास्तविकता में बेटी ड्यूटी निभाती रही
हकीकत यह है कि उनकी जगह उनकी बेटी ममता मरावी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रतिदिन ड्यूटी करती रही। सबसे गंभीर तथ्य यह है कि उपस्थिति पंजी में हस्ताक्षर द्रोपती मरावी के नाम से ही किए जाते रहे और उसी के आधार पर प्रत्येक माह वेतन का भुगतान होता रहा। यानी कागजों में मां काम करती रहीं, जबकि वास्तविकता में बेटी ड्यूटी निभाती रही।
यह फर्जीवाड़ा कुछ दिनों या महीनों तक नहीं, बल्कि करीब सात वर्षों तक लगातार चलता रहा। मामले ने विभागीय अधिकारियों की भूमिका को भी संदेह के घेरे में ला दिया है, क्योंकि बिना अधिकारियों की जानकारी या संभावित मिलीभगत के इतने लंबे समय तक इस तरह की अनियमितता का बने रहना मुश्किल माना जा रहा है।
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क्या कार्रवाई होती यह देखना होगा?
स्थानीय स्तर पर इस प्रकरण को लेकर चर्चा तेज है। लोगों का कहना है कि यदि समय पर निगरानी और नियमित निरीक्षण होता तो न केवल सरकारी धन के दुरुपयोग को रोका जा सकता था, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता भी प्रभावित नहीं होती। वर्षों तक एक अनधिकृत व्यक्ति द्वारा ड्यूटी किया जाना मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है।
मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मचा हुआ है। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि जांच कब शुरू होती है और दोषी कर्मचारियों व जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होती है। यह भी देखना होगा कि कार्रवाई केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है या वास्तव में सख्त कदम उठाए जाते हैं।
फिलहाल यह मामला स्वास्थ्य विभाग की पारदर्शिता और जवाबदेही पर एक बड़ा सवाल बनकर उभरा है। इस मामले पर खबर लिखे जाने तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।