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Neeraj Dangi: पाली, जालौर और सिरोही में एम्स जैसे चिकित्सा संस्थान खोलने की मांग, जानें सांसद ने क्या कहा
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, सिरोही Published by: सिरोही ब्यूरो Updated Wed, 19 Mar 2025 06:30 PM IST
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राज्यसभा में सांसद नीरज डांगी ने स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के बजट और कामकाज पर सदन में चर्चा के दौरान भाषण में कहा कि देश में स्वास्थ्य विभाग बहुत ही महत्वपूर्ण विभाग है। हम सब की यह मान्यता है कि एक स्वास्थ्य हजार नियामत अर्थात स्वास्थ्य मनुष्य की पूंजी है। आदमी की असली दौलत तंदुरुस्ती है। इससे बढ़कर कोई आशीर्वाद या दौलत नहीं। उन्होंने देश की स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधारात्मक बदलाव की आवश्यकता पर जोर देते हुए पश्चिमी राजस्थान के पाली, जालौर और सिरोही जिले की स्वास्थ्य सेवाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए तत्काल सुधार किए जाने एवं एम्स जैसे अत्याधुनिक केन्द्रीय उत्कृष्ठ संस्थान स्थापित किए जाने की मांग की।
सांसद नीरज डांगी ने स्वास्थ्य बजट पर चर्चा के दौरान कहा कि देश और सरकार का ध्यान पूरी तरह स्वास्थ्य सेवा पर होना चाहिए। आज जीवन रक्षक एवं सामान्य दवाइयां इतनी मंहगी हो गई हैं कि यह आम आदमी की पहुंच से बहुत दूर हैं। इन पर सरकार को ध्यान देते हुए दरें नियंत्रित किए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने राजस्थान में कांग्रेस सरकार के वक्त हुए स्वास्थ्य क्षेत्र में कार्य की सराहना करते हुए कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सरकार के शासनकाल में चिरंजीवी योजना के तहत जरूरतमंद मरीजों को 25 लाख तक का मुफ्त इलाज, कोविड-19 के समय कुशल प्रबंधन जिसे प्रधानमंत्री मोदी द्वारा भी सराहा गया।
पाली, जालौर और सिरोही के लोगों की दिक्कतों को बताया
डांगी ने पश्चिमी राजस्थान में पाली, जालौर और सिरोही जिले की स्वास्थ्य सेवाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यहां अस्पताल, बेरोजगारी, पिछड़ापन, गरीबी, शिक्षा का अभाव और छुआछूत आदि कई दिक्कतें हैं। इसके कारण इलाज के लिए गुजरात के पालनपुर, डीसा, अहमदाबाद जाना पड़ता है। जहां अच्छे इलाज के लिए भारी भरकम बिल चुकाना पड़ता है। आज जब हम 75 वर्षों की आज़ादी के बाद अमृत काल मना रहे हैं तो गरीब आदमी बीमारियों के कारण अपना घर-बार, खेत खलिहान बेचकर, ऋण लेकर इलाज को मजबूर हैं। हम उसे चिकित्सा व्यवस्था नहीं दे पा रहे हैं। आजादी के 75 वर्षों बाद भी मूलभूत समस्यायें पूर्ण नहीं हुई हैं। आप 70 साल की बात करते हैं। गत 10 सालों में आप पूरा कर लेते? अमृत काल में अमृत तो मरीजों को आप दे नहीं सकते, कम से कम जहर बरसाने का काम तो न करें। हमारे पास सुविधाओं से लैस अत्याधुनिक ट्रॉमा केयर सेंटर नहीं है। उन्होंने केन्द्र सरकार से मांग किया कि सिरोही, जालौर और पाली क्षेत्र में तत्काल आधार पर एम्स जैसे अत्याधुनिक केन्द्रीय उत्कृष्ठता संस्थान की स्वीकृति प्रदान कर बजट आवंटित करें।
बजट वृद्धि से नहीं होता है प्रणालीगत सुधार
सांसद नीरज डांगी ने कहा कि बजट वृद्धि से प्रणालीगत सुधार नहीं होता है। स्वास्थ्य बजट में 11 प्रतिशत की वृद्धि करके 1,03,851 करोड़ किया गया है लेकिन इसमें आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री PMJAY व्यय शामिल करने से ये वृद्धि मात्र 9 प्रतिशत है जो 1.4 बिलियन लोगों के देश के लिए पर्याप्त नहीं है। उन्होंने अपने भाषण में कहा कि ग्रामीण और शहरी स्वास्थ्य सेवाओं के बीच में गहरी खाई है, देश के 65 प्रतिशत अस्पताल शहरी क्षेत्रों में है जबकि 70 प्रतिशत आबादी गाँवों में रहती है। ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों और नर्सों की कमी सबसे बड़ी समस्या है, WHO के अनुसार, भारत में डॉक्टर जनसंख्या अनुपात 1:1456 है, जबकि वैश्विक मानक 1:1000 है। देश में प्रति 1,000 व्यक्तियों पर केवल 1.4 बेड्स उपलब्ध हैं, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अनुशंसित प्रति 1,000 व्यक्तियों पर 3.5 बेड्स से काफी कम है। गांवों में प्राथमिक, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में डॉक्टर नहीं है, प्रशिक्षित स्टाफ नर्स नहीं है, बेड्स, सोनोग्राफी मशीन, एक्सरे मशीन, एम्बुलेंस, दवाईयां, नहीं है, एमआरआई सुविधा का तो प्रश्न ही नहीं है।
स्वास्थ्य बीमा को बढ़ावा देने की है आवश्यकता
डांगी ने सदन में भाषण में कहा कि लाखों लोगों के परिवार चिकित्सा बिलों के कारण गरीबी में चले जाते हैं। बजट में उन प्रमुख नीतिगत हस्तक्षेपों (निर्णयों) को नजरअंदाज किया गया जो इस बोझ को कम कर सकते थे। स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम पर जीएसटी को 18 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत नहीं किया गया, जिससे कवरेज का विस्तार हो सकता था। केन्द्र सरकार द्वारा धारा 80 डी के अंतर्गत कर कटौती की सीमा 25,000 से बढ़ाकर 50,000 नहीं की गई है, जो स्वास्थ्य बीमा को बढ़ावा देने का एक खोया हुआ अवसर है।
इन मुद्दों की कर भी किया सदन का ध्यान आकर्षित
सांसद नीरज डांगी ने चिकित्सा शिक्षा की बात करते हुए कहा कि मेडिकल कॉलेजों में सीटें बढ़ाने का फैसला समस्याजनक है। इस साल 10,000 सीटें जोड़ने और पांच साल में इसे बढ़ाकर 75,000 सीटें करने की योजना है। यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार और मेडिकल कॉलेज खोलने जा रही है या और निजी मेडिकल कॉलेज को अनुमति देगी? चिकित्सा शिक्षा का विस्तार दक्षिण भारत में केंद्रित है, जबकि उत्तर और पूर्वोत्तर भारत में अभी भी सुविधाओं का अभाव है, जिससे क्षेत्रीय स्वास्थ्य सेवा असमानताएँ ओर गहरी हो गई हैं। मेडिकल शिक्षा के लिए कोई ब्याज मुक्त ऋण या सब्सिडी नहीं है, जबकि निजी कॉलेज 60 लाख से 1 करोड़ रुपये तक की. या इससे भी अधिक फीस वसूल रहे हैं। उन्होंने कहा कि कैंसर के मामले में केन्द्र सरकार ने उपचार को विकेंद्रीकृत करने के लिए जिला स्तरीय कैंसर देखभाल केंद्रों की घोषणा की, लेकिन प्रशिक्षित विशेषज्ञों, दवा आपूर्ति श्रृंखलाओं और निदान क्षमता के बिना, ये केंद्र बेकार ही रहेंगे। कैंसर का शीघ्र पता लगाने और इसके लिए अधिक बजट आवंटित किया जाना चाहिए, ताकि कैंसर रोगियों को समयबद्ध उपचार मिल सके। उन्होंने जिला अस्पतालों पर चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा कि जिला अस्पतालों के लिये किसी बड़ी सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) की घोषणा इस बजट में नहीं की गई है। चिकित्सा पर्यटन के मामले में भारत तुर्की और दुबई जैसे देशों से पीछे है, जिन्होंने वीजा नीतियों को सुव्यवस्थित किया है और ब्रांडिंग में आक्रामक रूप से निवेश किया है।
वित्तीय वर्ष के अंतिम महीनों में बजट राशि का उपयोग करने की जल्दबाजी के कारण अकुशल व्यय किया जाता है। एम्स और एम्स जैसे चिकित्सा संस्थानों में संकाय के रिक्त पदों पर चिन्ता व्यक्त करते हुए शीघ्र भरे जाने की मांग की। उन्होंने कहा कि नीट यूजी राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाओं को आयोजित करने की व्यापक जिम्मेदारी एनटीए जैसे छोटे व कमजोर संगठन को दी गई है जहां अधिकांश कार्य आउटसोर्स किया जा रहा है जो पेपर लीक का मुख्य कारण है। उन्होंने नीट परीक्षा आयोजन को बन्द कर विकेन्द्रीकृत परीक्षा प्रणाली को चुनने की मांग की।
डांगी ने ये दिए सुझाव
डांगी ने चर्चा में कुछ सुधारात्मक सुझावों के तहत बताया कि स्वास्थ्य बजट को जीडीपी के 2.5 प्रतिशत तक बढ़ाने, सीएसआर फण्डस को ग्रामीण स्वास्थ्य केन्द्रों के निर्माण में प्राथमिकता, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग को संसाधनों सहित मेडिकल कॉलेज स्थापित करने हेतु प्रोत्साहित करने और ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों और नर्सों की भर्ती, ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देने वाले डॉक्टरों को विशेष भत्ता, ताकि वे शहरों का रुख ना करें। आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन को हर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र तक पहुंचाना, ई-संजीवनी, टेलीमेडिसीन की सुविधा का विस्तार किया जाना चाहिए।
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