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गणतंत्र दिवस पर याद करें कादूनाला का बलिदान, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का एक गुमनाम अध्याय
26 जनवरी के गणतंत्र दिवस के उल्लास के बीच, अमेठी के मुसाफिरखाना स्थित कादूनाला 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की एक वीरोचित गाथा को जीवंत करता है। यह वही ऐतिहासिक स्थल है जहां भाले सुल्तानी रणबांकुरों ने अंग्रेजी सत्ता को सीधी चुनौती देते हुए 600 से अधिक वीरों का बलिदान दिया था। यह बलिदान आने वाली पीढ़ियों के गणतांत्रिक भविष्य की नींव बना। कादूनाला का संघर्ष केवल कागज पर दर्ज इतिहास नहीं, बल्कि मिट्टी में गिरे शहीदों के रक्त से उपजा गणतंत्र का बीज था।
मुसाफिरखाना तहसील मुख्यालय से कुछ किलोमीटर दूर, लखनऊ-वाराणसी हाईवे के नीचे बहता कादूनाला और उसके आसपास का वन क्षेत्र आज भी उस अभूतपूर्व प्रतिरोध की गवाही देता है। सात और आठ मार्च 1857 को, जनरल फ्रैक्स के नेतृत्व में बढ़ रही अंग्रेजी सेना को कादूनाला के रणबांकुरों ने सीमित संसाधनों और पारंपरिक हथियारों के बावजूद जबरदस्त टक्कर दी। उन्होंने आधुनिक हथियारों से लैस फौज को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था। नौ मार्च को विश्वासघात के कारण युद्ध की दिशा पलट गई। अंग्रेजी टुकड़ियों ने एक गुप्त दक्षिणी मार्ग से हमला बोल दिया। मिर्च मिश्रित गोलों की मार झेलते हुए अनेक वीर कादूनाला में समा गए, जिससे नाले का जल रक्तवर्ण हो उठा। शहीदों के कटे सिर प्रदर्शित करने जैसी अमानवीयता के बावजूद, अंग्रेजी सेना को इस क्षेत्र पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने में कई महीने लग गए, जो अंततः 28 अक्टूबर को संभव हुआ।
इस ऐतिहासिक संग्राम में बैसवारा के राजा राणा वेनी माधव, महोना के राजा अहमद हसन खां, अंगद सिंह, रघुबीर सिंह, हरिदत्त सिंह और माधव सिंह जैसे वीरों ने अद्वितीय साहस का प्रदर्शन किया। उन्होंने अपनी जान, माल और वैभव सब कुछ राष्ट्र के लिए न्योछावर कर दिया, पर पराधीनता स्वीकार नहीं की। आज गणतंत्र दिवस पर संविधान की शपथ लेते समय कादूनाला हमें यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र केवल अधिकारों का संकलन नहीं, बल्कि त्याग, संघर्ष और बलिदान की एक अमर परंपरा है। लोककथाओं में आज भी इस शौर्य की स्मृतियाँ जीवित हैं, जहां लोग ऐतिहासिक भाले और स्वतंत्रता संग्राम में प्रयुक्त तलवारों को सहेज कर रखते हैं।
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