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In the Kushagra murder case, the prosecution demanded the death penalty, while the defense pleaded for mercy
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कुशाग्र हत्याकांड में सजा पर सुनवाई के दौरान अभियोजन ने मांगी फांसी तो बचाव पक्ष लगाता रहा रहम की गुहार
कुशाग्र की सजा पर सुनवाई के दौरान अभियोजन ने दोषियों द्वारा गुरु-शिष्य संबंधों का कत्ल करने, शव के टुकड़े कर फेंकने की योजना जैसी आपराधिक मानसिकता और मृत्युदंड पर सुप्रीम कोर्ट की विधि व्यवस्थाओं का हवाला देते हुए तीनों दोषियों के लिए फांसी मांगी। वहीं, बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं ने तीनों की कम उम्र, आपराधिक इतिहास न होने और गरीबी का हवाला देते हुए सजा में रहम बरतने की गुहार लगाई।
डीजीसी दिलीप अवस्थी व एडीजीसी भास्कर मिश्रा ने तर्क रखा कि रचिता और कुशाग्र के बीच गुरु-शिष्य का संबंध था। हत्या ने गुरु-शिष्य परंपरा को कलंकित किया। गुरु को मां-बाप से बढ़कर दर्जा दिया जाता है लेकिन इस तरह की घटनाओं से लोगों का विश्वास टूटा है। ऐसे जघन्य अपराध के लिए फांसी से कम कोई सजा नहीं दी जानी चाहिए। कुशाग्र की ओर से पक्ष रख रहे अधिवक्ता कमलेश पाठक व चिन्मय पाठक ने तर्क रखा कि हत्यारों का उद्देश्य सिर्फ रुपयों के लिए कुशाग्र का अपहरण करना ही नहीं था बल्कि उनकी मानसिकता गंभीर अपराध करने की थी। पुलिस ने जो चापड़ व पन्नी आदि सामान बरामद किए, उससे साफ है कि हत्यारे कुशाग्र के शव को टुकड़ों में काटकर फेंकने की योजना बना चुके थे। गंभीर मानसिकता के साथ किए गए अपराध के लिए फांसी ही उचित सजा होगी। चिन्मय की ओर से बचन सिंह, मच्छी सिंह व बसंत संपत दुपारे के मुकदमों में सुप्रीम कोर्ट की ओर से मृत्युदंड की परिस्थतियों के संबंध में दिए गए तर्कों को बताया गया। कहा कि विरलतम अपराध की श्रेणी में सिर्फ शरीर को काटना या जलाना ही वीभत्सता नहीं है बल्कि इसके कई और पैमाने भी हैं। कुशाग्र की हत्या संबंधों और विश्वास की हत्या है। अपराधी फांसी के ही हकदार हैं।
अभियोजन के तर्कों का जवाब देते हुए रचिता के अधिवक्ता राजेश्वर तिवारी ने रचिता के मां-बाप की मौत के कारण बेसहारा होने, रचिता की कम उम्र और महिला होने का तर्क देते हुए सजा में रहम की अपील की। प्रभात के अधिवक्ता ओम नारायण द्विवेदी ने कहा कि प्रभात नवयुवक है, उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। कानून में सजा के बजाय सुधार पर बल दिया गया है। जान के बदले जान को हमारे कानून में मान्यता नहीं है इसलिए प्रभात को सुधरने का मौका देते हुए सजा में नरमी बरती जाए। शिवा के अधिवक्ता मनीष शर्मा ने कहा कि शिवा के पिता पैरालाइज्ड हैं। घर में कमाने वाला कोई नहीं है। उसका अपराध सिर्फ फिरौती के पत्र देने तक का ही है। उसका हत्या से कोई लेना-देना नहीं था इसलिए उसे कम से कम सजा दी जाए। सभी को सुनने के बाद कोर्ट ने सजा पर फैसला सुनाया।
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